Monday, January 31, 2011

एक अफ़साना

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हर रोज़ ये गुनाह   मैं सौ बार करता हूँ,
वो  नहीं  इस रास्ते , क्यूँ इंतजार करता हूँ...

सपना था कि  कभी मिलके  चलेंगे दो कदम,
हँस के  कहा था उसने, क्यूँ एतबार करता हूँ ...

आँखों में लिखी बातें कभी जुबां की हो न सकी,
हूँ  आईने में अब खड़ा,  क्यूँ इज़हार करता हूँ.... 

दीवारों पे बसाये मैंने मुहब्बत के अफ़साने,
न लगी खबर उनको , क्यूँ इश्तहार करता हूँ...

पाया है ज़ख्म जब भी गुजरा उनकी गलियों से,
उस सितमगर को क्यूँ ,  दोस्तों में शुमार करता हूँ ... 

आवाज गुम  जाती है, फासले की दुनियाँ में,
पास  वो न आए कभी , क्यूँ   इसरार करता हूँ...

बताते बताते  , छुपाया है हरदम,
पर जताने की ये कोशिश , क्यूँ हर बार करता हूँ...

हूँ न उनकी निगाहों में, न उनके ख़यालों में, 
पर हर सूरत मेँ उनका क्यूँ दीदार करता हूँ ...

होगा  उनकी किताबों में  संगीन   मेरा ज़ुल्म,
पर मैं आदमी हूँ ,आदमी से प्यार करता हूँ ...
.....रजनीश (31.01.2011)

Sunday, January 23, 2011

पोर्ट्रेट -3 (आत्मज्ञान!)

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जब भी उस राह से गुजरता हूँ,
वो मिलता है  ,
जिसकी दुनिया, उस एक खंबे से कुछ दूर 
जाकर  ही खत्म हो जाती है ,
मेरा भी फैलाव कितना कम है ,
मैं  भी तो एक लकीर पर चलता
बस एक छोर से दूसरे छोर को नापता रहता हूँ,
उस लकीर से बाहर कहाँ हूँ मैं ?

कल जब गुजरा था उसके करीब से,
तो उसके बदन की बदबू और चमड़ी पे चिपकी धूल की परतों
से लगा जैसे वो सदियों से नहीं नहाया,
जब पलटा और देखा अपने हाथ से
खुद के चेहरे को रगड़कर , कितनी कालिख थी,
मैंने देखा मेरे सिर पर कितना कूड़ा लदा है ,
और कीचड़ में खड़ा हूँ मैं  ,

फटे थे उसके कपड़े, झांक रही थी उसकी हड्डियाँ ,
अधनंगा , परत दर परत कपड़े लपेटे ,
पर जो खुला सो खुला ही था, कपड़े हारे हुए बस लटके थे ...
मैंने देखा मेरे कपड़े भी तो पारदर्शी हैं ,
कुछ नहीं छिप रहा उनसे , मुझे लगा जैसे
अपने कपड़ों पर किसी वृत्तान्त की तरह लिखा हुआ हूँ मैं ,

न वो किसी की बाट जोहता मिला कभी ,
न किसी और को देखा उसकी फिक्र करते ,
बस लोहा हो चुकी दाढ़ी पर हाथ फेरते
आसमान से पता नहीं क्या चुनता रहता है,
मैंने पाया मेरा इंतजार भी किसी को नहीं,
मेरे फिक्रमंद, दिल का हाल नहीं पूछते
क्योंकि दिल दुखाना नहीं चाहते ,
और उड़ना मेरी आदत है , 
इसलिए जब वो कुछ चुनता है आसमान में,
तो कई बार मेरे  पंख टकराए हैं उससे ,

उसके चेहरे पर एक विराम दिखता है,
कोई भाव आते-जाते नज़र नहीं आए कभी,
बस ,वो कभी नीचे देख मुस्कुरा देता है ,
मैं भी कभी कभी मुंह छुपा रो लेता हूँ ,
हँसता भी हूँ पर वो एहसास अक्सर गुम जाते हैं ,
उसने कुछ लकड़ियों से एक घर बनाया है
पर इतना छोटा कि खुद तो बाहर ही रहता है ,
मैंने देखा मेरा घर भी कितना छोटा है
ज्यादा लोग उसमें समाते ही नहीं,मैं भी पूरा नहीं समाता ,
मेरे पास अपने लिए ही जगह नहीं है...
उसे मैंने कभी कुछ कहते देखा , सुना नहीं
और मेरे कहे का भी तो कोई मतलब नहीं होता अक्सर...

उसके सामने से रोज गुजर कर ये जाना कि,
जो होता है वो मुझे भी दिखता नहीं, जो दिखता है मैं समझता नहीं ,
जो समझता हूँ वो मैं भी कहता नहीं, जैसा कहता हूँ वो करता नहीं,
जो करता हूँ उसका प्रयोजन नहीं समझता , कहाँ जा रहा हूँ पता भी नहीं ....
उसे रोज-रोज खंबे के पास
देखते-देखते अब ये यकीन हो गया है,
मुझे, कि हम दोनों पागल हैं ...
कम से कम मैं तो जरूर हूँ ....
...रजनीश (23.01.2011)

Saturday, January 22, 2011

व्याकरण और शब्दकोश

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चेहरे पे लिखी इबारत,
पढ़ना हो तो,
सिखाए गए व्याकरण से रिश्ता
तोड़ना पड़ता है,
भाषा की स्कूली किताब ,
वापस रखनी होती है शेल्फ मेँ ...
क्योंकि यहाँ शब्द एक लाइन में नहीं होते ,
पहले अल्प विराम और
फिर उसके बाद हो सकता है-
कई जाने-अनजाने चिन्हों के साथ 
कोई टूटे -फूटे शब्दों का कारवां,

चेहरे पर लटकती लिखावट में
भूतकाल  आ सकता है वर्तमान मेँ ,
प्रश्न हो जाता है उत्तर
और उत्तर मेँ मिलते हैं प्रश्न ,
चेहरे पर उभरे- इस मौजूद पल मेँ-
मुस्कुराते हुए शब्दों मेँ,
भविष्यकाल की किसी आशा
से   मुलाकात हो सकती है,
जो मैं है ,वो तू हो सकता है ,
और तू है , वो हो सकता है मैं...

चेहरे पर लिखी इबारत समझने मेँ,
खरीदे गए और अपने बनाए शब्दकोश  भी काम नहीं आते  ,
क्योंकि , खुशी के घर मेँ आपको
दुख का बसेरा मिल सकता है चेहरे पर,
ढाई आखर का अभिमान हो सकता है,
और घृणा मेँ लालसा.....
मेरा-तेरा , अच्छा-बुरा हो सकते हैं समानार्थी...
कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं ...
क्योंकि यहाँ कोई आत्मा नहीं रहती शब्दों में ,
और वो बदल-बदल मुखौटे  फिरते हैं चेहरों पर,

फिर जो चेहरे पर लिखा होता है ,
वो कभी-कभी छूने पर गुम हो जाता है,
कोई शब्द कभी  छुप जाता है,
और आँखेँ गड़ाकर देखो तो
कभी कोई अपना रूप ही बदल लेता है ,
ज्यादा करीब आओ
तो सारे के सारे  गुम हो सकते हैं
क्योंकि चेहरे पर उनके घर नहीं होते ,
वो भीतर चले जाते हैं ...
बड़ा विचित्र है उनका ठिकाना ,
जहां बैठा कोई पहनाता रहता है इन्हें मुखौटे ,
वो रहते हैं उस तिलस्म मेँ ,
जहां पर धड़कता है दिल,
वहाँ से बस कुछ बित्ते की दूरी पर ,
उनके कुछ कमरे ऊपर भी हैं 'भेजे' में  ,
कहाँ रहें , कहाँ से चलें ...
इसी ऊहापोह में शब्द भी थक जाते हैं कई बार,

ये शब्द नौकरी करते मिलते हैं
एक "अव्यक्त" की ,
जिसे  छुपाने या उभारने मेँ लगे होते हैं ये शब्द ,
जो चलते-चलते जुबां तक पहुँच पाते हैं
उन्हें सुन भी सकते हैं आप ,
बाकी इधर-उधर,
मसलन आंख वगैरह पर खड़े मिलते हैं  

बोलते चेहरे की बात
समझने /और झाँकते, फिरते शब्दों को पहचानने  -
उनके घर- उस तिलस्म तक जाना
होता है , और यारी करनी पड़ती है उनसे ,
खुद को बाहर फेंक कर वहीं रहना पड़ता है ,
वही चेहरा बन जाना होता है,
और तब शब्द , 
व्याकरण की असली किताब और असली डिक्शनरी
खुद ही लाकर रख देते हैं
आपके हाथों मेँ ....
....रजनीश (22.01.2011)

Wednesday, January 19, 2011

रात से बात

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जब चाँद- तारे 
रज़ाई ओढ़े, सो गए थे ,
हवा भी थकी ,
आंखे मूँदे ,लेटी थी पत्तों पर ,
सारे पंछी ,
चुग्गा-दाना भूले ,
अँधियारे में गुम गए थे...
और  जलते दिये का तेल,
लड़ते हुए अंधेरे से, खप गया था ,
सूखती बाती, हाँफते दिये की छाती
पर अब कालिख छोड़ रही थी,
तब,  कल 'रात' आई थी
मेरे कमरे में ,
पर मैं उसे नहीं मिला वहाँ ,
फिर  जब हवा ने अंगड़ाई ली
और  आँगन साफ किया-
सुनहली किरणों के लिए,
जाते जाते 'रात' ने पूछा था मुझसे,
कहाँ चले गए थे तुम ?
मैंने कहा तेल ढूंढ रहा था मैं,
बगल के कमरे मेँ,
'दिये' के लिए गया था वहाँ ,
एक सपना है.  दरअसल कुछ पुराना,
वो भी  तो है मेरे संग,
भटकते यूं ही आ गया था कभी ,
और तब से मेरे साथ ही रहता है,
भूल गया हूँ उसकी उम्र,
उसके चेहरे से भी पता नहीं कर पाता ,
सामने वाले पेड़ पर
हर साल पत्ते बदलते हैं,
पर इसका चेहरा बिलकुल नहीं बदला,
वो नहीं दिखा तुम्हें ? ,
वहीं बिस्तर पर तो था !
चादर मेँ छुपा था,
वही जगाए रहता है मुझे ,
दोनों ही जागते हैं,
सपना मेरे लिए और मैं सपने की खातिर,
तुम औरों की फिक्र करो...
उन्हें सुलाओ ...
थक गई होगी, जाओ अब आराम करो,
सपना भी वहीं साथ खड़ा था
मेरे कंधे पर हाथ डाले ,
फिर हम दोनों ने मिलकर 'रात' को विदा किया .....
......रजनीश (19.01.11)

Saturday, January 15, 2011

सूर्य वंदना

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हे सूर्य ! तुम्हारी किरणों से,
दूर हो तम अब, करूँ पुकार ।
बहुत हो गया कलुषित जीवन,
अब करो धवल  ऊर्जा संचार ।

सुबह, दुपहरी हो या साँझ,
फैला है हरदम अंधकार । 
रात्रि ही छाई रहती है,
नींद में जीता है संसार । 

तामसिक ही दिखते हैं सब,
दिशाहीन  प्रवास सभी ।
आंखे बंद किए फिरते हैं...
निशाचरी व्यापार सभी ।

रक्त औ रंग में फर्क न दिखे,
भाई को भाई   न देख सके ।
अपने  घर में ही  डाका डाले,
सहज कोई पथ पर चल न सके ।

हे सूर्य ! तुम्हारी किरणों से,
दूर हो तम अब, करूँ पुकार ।
भेजो मानवता किरणों में, 
पशुता से व्याकुल संसार ।
....रजनीश (15.01.11) मकर संक्रांति पर

Sunday, January 9, 2011

कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....

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आप इसे यहाँ मेरी आवाज में सुन सकते हैं ....
कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....
जो रहते हैं  बहुत दूर, शब्दों से ,
पर उन्हे छूने  कहीं जाना नहीं होता,
बस यहीं खड़े ,
करना होता है बंद आंखे,
और वो खुद बंधे चले आते हैं ।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं ....
जो  नहीं रहते हैं अब यहाँ ,
पर मरते नहीं  कभी, न बिछुड़ते हैं,
साल दर साल, 
जब भी पलाश पर फूल खिलता है ,
वो खुद मिलकर चले जाते हैं ।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं....
जो बंधते नहीं किसी धागे से,
जिनका एक चेहरा नहीं होता ,
बस दो पल फुर्सत के निकाल,
करनी होती है बातें आइने से,
वो खुद ही सामने उभर आते हैं।

कुछ अहसास ऐसे होते हैं....
जो कभी जनम नहीं पाते ,
जिनकी किलकारियाँ सुनाई नहीं देती,
ज़िंदगी की इस दौड़ में,
इससे पहले कि  आ सकें  ऊपर,
वो पैरों तले रौंद दिये जाते हैं ।
............रजनीश (09.01.11)

Saturday, January 8, 2011

मुश्किलें

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पढ़ा नहीं जाता,  आंसुओं से लिखा पन्ना..   
चखो कागज को , नमक का अंबार मिलेगा ....

महसूस नहीं होता, छूने से  दिल का खालीपन..
भीतर उतरो ,  वहाँ  सूना दरबार मिलेगा....

सुन नहीं सकते , कहकहों मेँ, दिल की धड़कन..
आँखों मेँ झांको , रोता हुआ प्यार मिलेगा ....

उजाड़ कहते हो, जिन टूटते खंडहरों को..
उधर से गुजरो , एक जिंदा संसार मिलेगा....

दूर बैठे हो क्यूँ ,मुंह फिराये हुए..
गले लगा लो,  बिछुड़ा हुआ यार मिलेगा ....

नहीं मिलता वो, पत्थरों की बस्तियों में..
पूजो इंसान को,  परवरदिगार मिलेगा ....
.......... रजनीश (08.01.11)

Wednesday, January 5, 2011

लकीर

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कभी 
एक लकीर खींची थी
मैंने , जमीन पर /
आज कोशिश की
उसे मिटाने की/
आज लड़ा उस लकीर से /
अपनी जमीन पर गड्ढे
कर लिए मैंने/
मिट्टी निकाली, उस
गहराती लकीर पर डालने/
मिट्टी निकालते -निकालते...
गड्ढे  में ही फिसल गया /
अपने हाथ-पैर
ही तुड़वा बैठा !
और लकीर गहराती रही ...
ये लकीर  ऊंची दीवार लगती है ...
अब उस लकीर से घिरा, लहूलुहान ,
सोचता हूँ ...
आखिर , खींची ही क्यूँ
ये लकीर मैंने ,
क्यों बनाई ये सीमा  !!!
लकीरें खींचने की
ये लत ,
बहुत तकलीफ देती है,
हर बार दिल पर निशान पड़ते हैं /
पर  क्या करूँ ,
मजबूर हूँ...
....रजनीश (05.01.11)

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