Sunday, March 4, 2012

कुछ शेर ...कुछ मंज़र

















मुझे एक ख़्वाब अधूरा क्यूँ बार बार दिखा
मेरा सितमगर ही हरदम मुझे मेरा यार दिखा

अपने हिस्से नहीं मांगी थी तुझसे ये राह या रब
मंजिल नहीं बस पत्थरों पे जिक्रे-यार दिखा

किससे कहें कहाँ जा के अपना रोना रोएँ
यहाँ हर शख़्स होता तकलीफ़ों से दो-चार दिखा

इंसाफ़ की उम्मीद थी मुझे भी उस अदालत से
पर वहाँ भी मुझे तराजू लिए भ्रष्टाचार दिखा

करती फैसला इक बटन पांचसाला किस्मत का
हर उम्मीदवार करता बारी का इंतजार दिखा

और क्या कहें क्या लिखें अब इस कायनात पर
इसका ज़र्रा-ज़र्रा तो हमें तस्वीरे-यार दिखा

कहते हैं बेदर्द है ये ज़माना जरा बचके चलो
अपनी नज़रों से हर तरफ़ प्यार ही प्यार दिखा  

.....रजनीश (04.03.12)

11 comments:

रविकर said...

बहुत सुन्दर |
तीन शेर तो सवा शेर हैं बंधू ||
बधाई ||

veerubhai said...

बहुत खूब .होली मुबारक .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इंसाफ़ की उम्मीद थी मुझे भी उस अदालत से
पर वहाँ भी मुझे तराजू लिए भ्रष्टाचार दिखा

बहुत खूबसूरत शेर कहे हैं ....

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अंदाज़....

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

प्रभावित करती अभिव्यक्ति ....बहुत उम्दा शेर

प्रवीण पाण्डेय said...

कितना कुछ दिखता है, इस विश्वपटल पर।

mridula pradhan said...

sunder,samyik kavita.....

Shaifali said...

कौनसी पंक्तियों को सर्वश्रेठ कहू या किसपर ऊँगली रख कहूँ की यह मुझे ज्यादा अच्छी लगी, कहना अत्यंत मुश्किल है. हर शब्द पर जीवन की सच्चाई और प्यार के किसी रूप का नाम लिखा है.
बेहतरीन रचना रजनीशजी.

मनीष सिंह निराला said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति !
होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दाद तो बनती है.

आशु said...

रजनीश जी ,

बहुत सुन्दर ग़ज़ल..एक एक शेयर काबिले तारीफ है!

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