Sunday, August 26, 2012

डरी-डरी सी ज़िंदगी

डरी ज़िंदगी, आँखें नम हैं
अफवाहों के बाज़ार गरम हैं

कहीं है बारिश कहीं पे सूखा
कोई डाइट पर कोई है भूखा
विषमताओं के इस जंगल में
भटक रहे अपने कदम हैं

कभी कोयला कभी है चारा
घोटालों ने सभी को मारा
बचा खुचा महंगाई ले गई
क्या कहें बस  फूटे करम हैं

ये मेरा हक़ वो मेरा अधिकार
सब मिले मुझे मैं न जिम्मेदार
दूसरों पर  अंगुलियाँ उठाते
बड़े चतुर  मेरे सनम हैं

अब ये शहर  रहा नहीं मेरा
छोड़ चला मैं अपना बसेरा
डरी  ज़िंदगी , आँखें नम हैं
अफवाहों के बाज़ार गरम हैं
......रजनीश (26.08.2012)

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