Wednesday, September 28, 2011
एक गीली नज़्म
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कई बार की थी कोशिश कि पढ़ सकूँ उनकी आँखों में लिखी एक नज़्म पर नज़रें हर बार बस देख सकीं उन शब्दों की सूरत और पढ्ना ही ना हुआ वो ...
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Tuesday, September 27, 2011
एक और पड़ाव
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(अपने ही जन्म दिवस पर ...) बीतते जाते साल दर साल एक दरख़्त बढ़ता जाता है और नए नए रास्ते मेरी झोली में गिरते जाते हैं हर साल थोड़ा और ...
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Friday, September 23, 2011
फैलता जहर
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कुछ लाइनें बस बढ़ती चली जाती हैं कुछ बेदर्द राहें लंबी होती चली जाती हैं जब लगता है जो चाहा वो बस अब मिला मंज़िलें कुछ कदम दूर चली जाती...
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Sunday, September 18, 2011
सपनों का हिसाब-किताब
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कल रात बैठा लेकर सपनों का हिसाब किताब अरमान, तमन्नाएँ , सपने और हासिल का कच्चा चिट्ठा लिए सोचता रहा कहाँ खर्च किया पल दर पल खुद को और...
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