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Monday, June 5, 2017

पर्यावरण दिवस













पर्यावरण दिवस
की जरूरत
तय  हो  गयी थी
उसी वक्त
जब पहली बार
पत्थर रगड़कर
आग बनाई थी हमने
पेड़ कभी याद आएंगे
तय हो गया था
उसी वक्त
जब पहला पेड़
काटा था हमने
बेदम हो जाएंगी साँसे
तय हो गया था
उसी वक्त
जब जल से हटकर
कोई द्रव
बनाया था हमने
शोषण होगा धरा का
ये तय हो गया था
उसी वक्त
जब कुछ तलाशने
पहली बार चीर
छाती धरा की
एक गड्ढा बनाया था हमने
ये सब तय था
क्योंकि हमारी दौड़ ही है
अधिक से अधिक
पा लेने की
जीवकोपार्जन के नाम पर
दोहन हमारा स्वभाव ,
दिमाग चलता है हमारा,
एक होड़ के शिकार हैं हम
क्योंकि,
विकासशील हैं हम
आविष्कारक हैं
अन्वेषक हैं
प्रगतिशील हैं
प्रबुद्ध और सर्वोत्कृष्ट
प्रजाति हैं हम
हमारी जरूरतें
हमारी जिम्मेदारियों से
हमेशा आगे रहीं हैं,
तो अब मनाते रहें
पर्यावरण दिवस
                ••••••रजनीश (05/06/17)

Wednesday, June 26, 2013

वजूद का सच


तोड़कर भारी चट्टानें
 बनाया घर
 रोककर धार नदियों की
 बनाया बांध
 काटकर ऊंचे पहाड़
बनाया रास्ता
छेद कर पाताल
बनाया कुआं
पार कर क्षितिज
रखा कदम चांद पर
नकली बादलों से
जमीं पर बरसाया पानी
बंजर जमीन को सींच
बोया कृत्रिम अंकुर
क्या क्या नहीं किया ?
नदियों की धाराएँ मोड़ीं
हरे भरे पेड़ों को काटा
सुखाया सागरों को
कंक्रीट के जंगल बनाए

सपने की तरह उड़ना
तेज मन की तरह दौड़ना
सब कुछ आ गया मुट्ठी में
खुद से बेखबर रहने लगे

फिर आया एक जलजला
ढह गए सपनों के महल
बह गया इंसानी दंभ
सब छूट गया हाथ से फिसल
खोया खुद को
खो गए सब अपने
ना बचे खुद
ना बचे सपने
....रजनीश (26.06.13)

Monday, May 27, 2013

जैव विविधता










सूरज की श्वेत किरणों में
समाये हैं सब रंग
किरणों के अभाव में है
काला भयावह अंधेरा
श्वेत और काले आयामों के बीच
सांस लेती है एक खूबसूरत तस्वीर
सूरज चलाता है ब्रश
मिला सब रंगों को इक संग
श्वेत किरणें बरसती
धरती के कैनवास पर
और सांस लेते रंग चहुं ओर
बिखेरते इंद्रधनुषी छटा
एक ऐसा कैनवास 
जो फैला जल थल और नभ पर 
सुंदरता जन्म लेती है
इस विविधता में 
और साँसे लेता है जीवन
अपने असंख्य स्वरूपों में
एक रंग का अस्तित्व और
उसकी सुंदरता
दूसरे रंग के होने में है
हर रंग जरूरी है
प्रकृति का हर रूप जरूरी है
संगीत की पूर्णता में
लगता है हर सुर
सुर हैं स्पंदन हृदय का
जीवन का अंतरनाद
हर तरंग हर ताल हर स्वर
जुड़े है ज़िंदगी के रूपों से
जीवन संगीत है
हर सुर जरूरी है
जीवन का हर रूप जरूरी है
जीवन के पल रंगबिरंगे 
विशिष्ट गंधों से सुवाषित
अपनी सुर ताल में नाचते
बनाते तस्वीर एक जीवंत
सूरज ने दी श्वेत किरणें
ताकि मिले सब रंग
ना रह जाए तस्वीर अधूरी
इसलिए कोशिश करें
बटोरें बचाएं हर रंग
ताकि तस्वीर बने पूरी

.......रजनीश (27.05.2013)

बायोडायवर्सिटी यानि 
"जैव विविधता " को समर्पित 
The International Day for Biological Diversity 
(or World Biodiversity Day) is a United Nations
sanctioned international day for the promotion of biodiversity issues

Wednesday, May 1, 2013

बहता हुआ पसीना












( साल भर पुरानी कविता पुन: पोस्ट कर रहा हूँ )

बहता है पसीना
तब सिंचती है धरती 
जहां फूटते है अंकुर 
और फसल आती है 

बहता है पसीना 
तब बनता है ताज 
जिसे देखती है दुनिया
और ग़ज़ल गाती है 

बहता है पसीना 
तब टूटते है पत्थर 
चीर पर्वत का सीना 
राह निकल आती है

बहता है पसीना 
तब बनता है मंदिर 
चलती है मशीनें 
जन्नत मिल जाती है 

जो बहाता पसीना 
जो बनाता है दुनिया 
उम्र उसकी गरीबी में 
क्यूँ निकल जाती है 

....रजनीश (01.05.2012)
अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर 
अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस 1 मई को पूरे विश्व भर में मनाया जाता है । 
International Workers' Day is the commemoration of the 1886 Haymarket affair in Chicago
The first May Day celebration in India was organised in Madras 
by the Labour Kisan Party of Hindustan on 1 May 1923
(जानकारी  विकीपीडिया  से साभार ...)

Wednesday, March 13, 2013

झूठे सपनों के पार

















है सूरज निकल पूरब से
 जाता हर रोज़ पश्चिम की ओर
पानी लिए नदियां हर पल
हैं मिलती रहती सागर में

बादल बरस बरस कर
करते रहते हैं वापस
जो धरती से लिया,
हर साल हरी हरी चादरें
ढँक लेती है धरती को इक बार
एक नृत्य हर वक्त
चलता रहता है
संगीत की लहरों पर

बदलते रहते हैं पत्ते
और बदलते पेड़ भी
देखती हैं बदलती फसलों को
खेत की मेड़ भी
ज़िंदगी हर पल लेती  सांस
फूटती कोपलों, पेड़ की डालों में
घोसलों, माँदों में पनपती असल ज़िंदगी
ना है ख्वाबों ना ख़यालों में

सब कुछ कितना नियत
कितना सरल
एक रंग बिरंगा चक्र
पर नहीं जाती मिट्टी की खुशबू
बंद नहीं होता चहकना
बंद नहीं होती पानी की कलकल
बंद नहीं होता पत्तों का हवा संग उड़ना
नहीं फीका पड़ता और
नहीं बदलता कोई भी रंग
सब कुछ वैसा ही खूबसूरत
रहा आता है समय की परतों में

पर  अंदर इस संसार के
है  संसार  और एक
बहुत अजीब और बहुत ही गरीब
जहां रुक जाया करता है  सूरज
सुबह नहीं होती कभी कभी
और कभी बहुत जल्दी आ जाती है शाम
जहां सावन में भी हो जाता है पतझड़
जहां दिन के उजाले में भी अक्सर
नहीं धुल पाता रात का अंधेरा
जहां नृत्य में भी बस जाता है शोक
जहां से  नज़र नहीं आता आँखों को
कायनात का खूबसूरत खेल
जहां नहीं सब कुछ सरल और सीधा
जहां है बहुत कुछ बनावटी
जहां बदरंग लगते नज़ारे
जहां गीत नहीं देता राहत

अजीब सी बात है
जब भी इस झूठी चहारदीवारी
को लांघने की कोशिश करता हूँ
कभी खुद लौट जाते हैं पैर
कभी कोई पकड़कर
खींच लेता है वापस
और मैं खड़ा  इस गरीब
और झूठे संसार से
झांक-झांक बाहर
यही सोचता हुआ हैरान हूँ
कि टूट क्यूँ नहीं जाती
ये मोटी-मोटी दीवारें
ताकि सामने के उस असली संसार से
महक लिए ठंडी मंद बयार
मुझ तक भी आ पहुँचती
और हर सुबह सुबह ही होती
और हर शाम होती एक शाम ...
रजनीश (13.03.2013)  

Friday, June 29, 2012

बारिश में धूप

बारिश से धुले
चमकते पत्तों पर
उतरी धूप
फिसल कर
छा जाती है
नीचे उग आई
हरी भरी चादर पर

बादल रुक जाते हैं
और हल्की ठंडी
हवा के झोंकों में
कुछ दिनों से
 प्यास बुझाती धरती
करती है थोड़ा आराम

ये धूप किसी के
कहने पर आ गई थी
वो सम्हालता अपना 
उजड़ा आशियाना
कोई तानता
अपनी छत दुबारा

जो धरती पी न सकी
वो धाराओं में बह गया
और ले गया साथ
कुछ का सब कुछ
ये सब करते हैं
धूप का शुक्रिया अदा

और कोई धूप को 
देख करता था रुख 
बादलों की ओर
बार-बार और कहता था 
कि तुम रुक क्यूँ गए
कि अभी तक
नहीं पहुंचा पानी
पोरों में, और फूटे नहीं हैं
अंकुर अभी बीजों में
फिर धूप से कहता था
तुम क्यूँ आ गईं

वहीं कोई बेखबर
इस धूप से बस यूं ही
चला जाता है और
पानी से भी
नहीं पड़ता उसे कोई फर्क 
इन्हें कर लिया है उसने बस में

वही धूप वही बादल
वही पत्ते वही पानी , पर
एक सुबह का एहसास
हर किसी के लिए
अलग-अलग होता है
....रजनीश (29.06.2012)

Tuesday, May 1, 2012

बहता पसीना











बहता है पसीना
तब सिंचती है धरती 
जहां फूटते है अंकुर 
और फसल आती है 

बहता है पसीना 
तब बनता है ताज 
जिसे देखती है दुनिया
और ग़ज़ल गाती है 

बहता है पसीना 
तब टूटते है पत्थर 
चीर पर्वत का सीना 
राह निकल आती है

बहता है पसीना 
तब बनता है मंदिर 
चलती है मशीनें 
जन्नत मिल जाती है 

जो बहाता पसीना 
जो बनाता है दुनिया 
उम्र उसकी गरीबी में 
क्यूँ निकल जाती है 

....रजनीश (01.05.2012)
अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर 

Tuesday, March 15, 2011

कंपन

DSCN3703
धरती काँपती है ,
हर तरफ होता विनाश साक्षी है ।
दिन में ,
कुछ पलों के लिए
मैं  भी जमीन पर होता हूँ,
पर कभी महसूस नहीं हुआ,
जमीन का तनाव, वो कंपन ।
कल कान लगाकर
सुनने  की कोशिश की
धरती की धड़कन,
बस अपनी ही ध्वनि सुन सका ।
पर, शांति के इस समुद्र का  तल
अशांत पत्थरों का घर क्यूँ  है ?
धरती  अधूरी है अभी ,
अजन्मी, अर्धविकसित,  
तभी तो भीतर ये हलचल है ।
कुछ अभी तक अधूरा ।
क्यों ,मेरे अंदर भी
ढेर सारा और दबा हुआ
लावा है ?  क्यूंकि मैं भी
इसी धरती का पुत्र हूँ ?
इसका अंश , पूरा-पूरा धरती जैसा ,
मैं भी तो अभी गर्भ में हूँ ।
उसी अधूरेपन, उसी अपूर्णता
का रोपण इसकी छाती
पर भी करता हूँ ।
अपनी दुनिया बसाता हूँ,
एक अस्थिर नींव पर
अधूरा, अशक्त मकान  बनाता हूँ
और करता रहता हूँ असफल कोशिश
अपनी नश्वरता को पोषित
करने की इस घर में ।
बस एक आशा है ..
जब धरती  बन जाएगी पूरी,
तब  नदी  कभी गांव में नहीं आएगी,
सागर तांडव नहीं करेगा ,
झील गुम नहीं होगी,
पहाड़ चलना बंद कर देंगे,
हरी-हरी  चादर को नहीं जलाएगा लावा,
कोई घर भी नहीं टूटेगा,
और फिर मेरा जन्म होगा ,
एक शांत, संतुष्ट और सम्पूर्ण मैं ...
..रजनीश (15.03.2011)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....