Showing posts with label वक्त. Show all posts
Showing posts with label वक्त. Show all posts

Thursday, October 15, 2020

वक्त बीतता गया

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जीतता गया 
कुछ भीतर रीतता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जोड़ता गया
कुछ पीछे छोड़ता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ जुटाता गया 
कुछ यूं ही लुटाता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ निभाता गया 
कुछ रिश्ते भुलाता गया

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं कुछ अपनाता गया
कुछ मौके ठुकराता गया

वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा 
मैं सब को हंसाता गया 
कभी खुद को रुलाता गया 

वक्त बीतता गया 
लम्हा दर लम्हा 
मैं जीवन की बगिया
सींचता गया 
 वक्त बीतता गया 

..... रजनीश (१५.१०.२०२०, गुरुवार)

Monday, October 12, 2020

कुछ बातें इन दिनों की


जिंदगी रुक सी गई है
कदम जम से गए हैं 
एक वायरस के आने से
कुछ  पल थम से गए हैं 

कहीं  कब्र नसीब नहीं होती
कोई रातोरात जलाया जाता है
इंसानियत  शर्मसार होती है
उसे एक खबर बनाया जाता है 

कभी होती  नहीं हैं खबरें 
बनाई  जाती हैं
कभी होती नहीं जैसी
दिखाई जाती हैं 

जिसे समझा था दुश्मन
अल्हड़ बचपन का 
बन गया  लॉकडाउन  में
वो जरिया शिक्षण का

पास आने की चाहत
 पर दूर रहने की जरूरत
 किस ने कह दिया जिंदगी से
 मुसीबतें कम हो गई हैं ?

....रजनीश (१२.१०.२०२०, सोमवार)

Monday, May 28, 2018

घड़ी की टिक-टिक


वक्त गुजरता जाता है
समय बदलता जाता है
इक पल आता
इक पल जाता
पल दर पल मंजर बदलता
संसार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो मैं था
वो अब मैं नहीं
जो तुम थे
वो अब तुम नही
पल दर पल बदलते धागे
करार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो कोपल थी
अब पौधा है
जो पौधा था
अब दरख्त है
धरती पर दिन रात बदलते
और उसका श्रृंगार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो बूंद में था
अब दरिया में
जो दरिया में
अब सागर में
सागर से बादल में जा
कहीं और बरसता जाता है
समय बदलता जाता है

ना सूरज वही
ना चांँद वही
ना धरती और ब्रम्हांड वही
संग घड़ी की टिक-टिक
कण-कण का रुप आकार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है..
                   ....रजनीश (28.05.18)
   

Tuesday, May 30, 2017

वक्त-वक्त की बात है

वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त खोया कभी वक्त पाया
कभी वक्त ज्यादा कभी वक्त कम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त भूला कभी उसे भुलाया
कभी जोश ज्यादा कभी होश गुम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त रूठा कभी वक्त गाया
कभी हंसी गूँजी कभी आंख नम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त छूटा कभी लौट आया
कभी वक्त आगे कभी आगे हम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त भारी कभी वक्त भाया
कभी वक्त हारा कभी हारे हम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त साथी कभी वक्त ने मारा
कभी जान आयी कभी निकला दम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त ने रोका कभी हमें  भगाया
कभी नमक ज्यादा कभी चीनी कम
वक्त-वक्त की बात है
कभी वक्त रोया कभी वक्त रुलाया
कभी तुम हमारे  कभी अपना गम
वक्त-वक्त की बात है
हम वही हैं तुम वही हो
बस दिन कभी , कभी रात है
वक्त-वक्त की बात है,  वक्त-वक्त की बात है
                                             .....................रजनीश (30/05/17)

Wednesday, July 18, 2012

घूमता पंखा

मेज पर बिछे काँच में
देखता हूँ घूमते पंखे की परछाई
नहीं दिखती  थकान मुझे
उसके चेहरे पर एकबारगी से
पर देखा जब गौर से  तो
हुआ एहसास उसकी अधेड़ उम्र का

आती है कुछ आवाज़ भी
जब वो घूमता है,
शायद कुछ जंग और कोई पुर्जा है टूटा,
वक्त की कुछ खरोंचें
और उखड़ता पेंट बदन से,
अब  नहीं रही वो चमक
नयी ना रही अब वो छत 
अब परछाईं साफ नहीं देख पाता
मेज पर लगा काँच भी,
पंखे का पुरानापन
काँच में नज़र नहीं आया
एकबारगी से,
पर तन्हा बैठे बैठे
उसके पुरानेपन से
आज हो ही गई मुलाक़ात

दरअसल हवा लेते लेते
कभी ध्यान ही नहीं गया
पंखे की तरफ,
कितनी गर्मियाँ जी गया
कितना पसीना सुखाया ,
छत से उल्टे लटके और
रात दिन मेरे लिए
घूमते इस पंखे
के नीचे बैठ
ज़िंदगी के कितने पन्ने
रंग लिए मैंने


अहमियत ही क्या है पर इसकी
जिस दिन नहीं मिलेगी हवा
बदल दूँगा इसे...
मुझे हवा चाहिए
ये पंखा नहीं

और मैं भी उस पंखे से ज्यादा
कुछ नहीं ...
.....रजनीश (18.07.12)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....