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Tuesday, May 1, 2018

आंखों देखी

उनकी बातों मेँ अपना सँसार देखा है
उन्हें जब भी देखा यार देखा प्यार देखा है

सुना है बचपन भगवान का चेहरा होता है
उसी चेहरे पे दरिंदों का अत्याचार देखा है

जो देखकर भी अनदेखा किया करती थीं
आज उन  बेफिक्र आखों में इन्तज़ार देखा है

ईमान की तलाश हमें ले गई जहाँ जहाँ
वहाँ इन्सानियत की खाल में भ्रष्टाचार देखा है

खुद को बचा रखने  बेच देते हैं खुद को
जहाँ अरमानों के सौदे ऐसा बाजार देखा है

इंसानियत के मरने की खबर बड़ी पुरानी है
पर मिल जाती है जिंदा ये चमत्कार देखा है

बीते वक्त को   पुकार देखा ललकार देखा
कभी लौटते कारवां को कभी सिर्फ गुबार देखा है

......रजनीश  (12.05.18)

Saturday, March 24, 2018

थोड़े की जरूरत



कैसे जिएं वो रिश्ता जिसमें थोड़ा प्यार ना हो
ना हो इन्कार की सूरत पर थोड़ा इकरार ना हो

आँधियाँ ही तय करेंगी उस नाव का किनारा
फँसी हो मझधार में पर जिसमें पतवार ना हो

ना बहारों की चाहत  ना महलों की ख्वाहिश
बस साँसें चलती रहे और जीना दुश्वार ना हो

गर आसाँ हो रास्ता तो मंजिल मजा नहीं देती
वो मोहब्बत भी क्या  जिसमें इन्तजार ना हो

घिर चाहतों , गुरूर , खुदगर्जी में घुटता दम
ऐसा घर बनाएँ जिसमें कोई दीवार ना हो

......रजनीश (24.03.18)

Friday, March 6, 2015

आओ खेलें होली ...

.


रंग लगे भंग चढे
अबीर और गुलाल उड़े
खेलें सब मिलके
रंग भरी होली

ढ़ोल बजे रंग सजे
नाचें सब धूम मचे
खेलें सब मिलके
उमंग भरी होली

रंगों से राह पटे
गुझिया मिठाई बंटे
खेलें सब मिलके
स्वाद भरी होली

प्यार बढ़े बैर घटे
बेरंग ना कोई बचे
खेलें सब मिलके
खुमार भरी होली

हाथों में रंग लिए
दिल से आज दिल मिलें
खेलें सब मिलके
प्यार भरी होली

....रजनीश (06.03.15) 
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.... 

Saturday, January 24, 2015

दरअसल ....



















था न कोई उस राह , पर इंतजार हम करते रहे
उनको हमसे नफ़रत सही , पर प्यार हम करते रहे    

वक़्त की ख़िदमत में , अक्ल-ओ-दिल से लिए फैसले
और किस्मत के नाम , हर अंजाम हम करते रहे

रिश्ता निभाने खुद को भुला देने से था परहेज़ कहाँ  
बस रिश्ता बनाने का जतन हम करते रहे

बसा जो दिल में था उसे क्या भूला क्या याद किया  
बस खोए हुए दिल की तलाश हम करते रहे

क्या कहें क्या अफसाना क्या मंज़िल क्या ठिकाना
बस एक सफ़र की गुजारिश हम करते रहे

............रजनीश (24.01.15)

Sunday, March 16, 2014

खोज प्यार के रंग की ...

.
रंग बिरंगी दुनिया में
रंग भरे मौसम में
रंगों के मेले में
एक रंग ढूँढता हूँ मैं

रंग बिरंगे चेहरों में
रंगीन गलबहियों में
रंग गई मिठाइयों में
एक रंग ढूंढता हूँ मैं

रंग लगी गलियों में
रंग लगे नगाड़ों में
रंग भरी दीवारों में
एक रंग ढूँढता हूँ मैं

रंग भरी पिचकारी में
रंग से सनी मिट्टी में
रंग सजी दुकानों में
एक रंग ढूँढता हूँ मैं

रंगों की भीड़ में
भंग की तरंग में
होली के रंग में
एक रंग ढूँढता हूँ मैं ...
........रजनीश ( 16.03.2014)
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ 


Wednesday, October 23, 2013

प्यार का दर्द ...

सुबह की मंद बयार में
ओस के बिछौने पे खड़े होकर 
कोमल पंखुड़ियों से छनकर आती
मीठी धूप में नहाना
कितना अच्छा लगता है
और यही धूप पेड़ों के सहारे
जब ऊपर चढ़ती और बढ़ती है
कसैली हो जाती है
झुलसाने लगती है
वक्त की आंच के मानिंद
... 
लू के थपेड़ों में
घने दरख्त की ठंडी छाँव
जुल्फों के साये का सुकून देती हैं
गुलाबी ठंड में हो जाती है
धीमी कुछ आंच जख्मों की
पर पहाड़ों से उतरते-उतरते
ये ठंड काली हो जाती है
हड्डियाँ कंपा देती है
और खून जमा देती है
दब जाती है ज़िंदगी 
बर्फ की मोटी परतों के तले 
 ....
माँ की तरह
ढेर सारा पानी लिए
बरसते हैं बादल
प्यासी धरती की खातिर
सींच देते हैं जमीन
फुहारें ले आतीं हैं
चाहतों का मौसम
सपनों की बारिश का आलम
और कभी बरसते-बरसते
इतना बरस जाते हैं बादल
कि आ जाता है सैलाब
जो डुबो कर सब कुछ
बहा ले जाता है सारे सपने 
 ....
और ऐसा ही कुछ 
प्यार के साथ भी है ...

......रजनीश (23.10.2013)

Monday, September 30, 2013

अब ...क्या कहें


प्यार क्या है , क्या कहें
तकरार क्या है , क्या कहें

राह सूनी, ना पैगाम कोई  
इंतज़ार क्या है , क्या कहें

हैं ना वो, ना तस्वीर उनकी
दीदार क्या है, क्या कहें

थोड़ी फकीरी , है मुफ़लिसी भी
बाज़ार क्या है, क्या कहें

दुश्मन नहीं, ना दोस्त कोई
तलवार क्या है, क्या कहें

दिल में दर्द, है सर भी भारी
बीमार क्या है, क्या कहें

घर नहीं, ना शहर कोई
दीवार क्या है, क्या कहें

जुबां कहती, निगाहें चुप हैं
इज़हार क्या है, क्या कहें

हर गली बस बैर मिलता
प्यार क्या है, क्या कहें 
......रजनीश (30.09.13)

Sunday, September 8, 2013

प्यार की चाह में

गर प्यार हो दिल में
हर पल सुहाना होता है
प्यार की चाह में
हर दिल दीवाना होता है

उनके दीदार को
तरसती हैं हरदम आँखें
करीब उनके चले जाने 
हरदम एक बहाना होता है

उनके लब हिलते हैं
तो फूल खिलते है
उनका हर लफ़्ज़
एक तराना होता है

प्यार पर सिर्फ़
गेसूओं की छाँव नहीं
दूर रहकर भी
प्यार निभाना होता है

प्यार देने में है असल
पाने की सिर्फ़ चीज़ नहीं
प्यार खुशियाँ लुटाना
आँसू पी जाना होता है

गर प्यार हो दिल में
हर पल सुहाना होता है
प्यार की चाह में
हर दिल दीवाना होता है 

......Rajneesh (08.09.2013)

Monday, August 12, 2013

चलो ऐसा अफसाना लिखें


चलो ऐसा अफसाना लिखें
जिसके पन्नों पे हो
प्यार की दास्तां
संग चलने का वादा लिखें
चलो ऐसा अफसाना लिखें

चलो ऐसा अफसाना लिखें
जिसके शब्दों में हो
प्यार का रंग बयां
डोर से बंधा वो नाता लिखें
चलो ऐसा अफसाना लिखें

चलो ऐसा अफसाना लिखें
कभी कलम तुम बनो
कभी हाथ मैं बनूँ
कभी अल्फ़ाज़ तुम चुनो
कभी जज़्बात मैं चुनूँ
जिसे पढ़के मिल जाए
मुहब्बत का जहां
हरदम वफ़ा का रिश्ता लिखें
चलो ऐसा अफसाना लिखें

चलो ऐसा अफसाना लिखें
जिसकी स्याही हो मीठी
पन्नों में हो महक
सोख ले आसुओं को
पढ़ने की हो ललक
और गुनगुना कर मिले
मुहब्बत को जुबां
प्यार में भीगा गाना लिखें
चलो ऐसा अफसाना लिखें

चलो ऐसा अफसाना लिखें
जहां ना हुस्न ना शबाब
ना पर्दा ना नकाब
ना साक़ी ना शराब
ना सवाल ना जवाब
दिल से लिखा और दिल पर लिखा
प्यार भरा नज़राना लिखें

 चलो ऐसा अफसाना लिखें
....रजनीश (12.08.13)

Thursday, June 20, 2013

ये तय नहीं ...


तय है कि, धरती का सूरज
निकले है पूरब से
पर मेरा भी सूरज, पूरब से निकले
ये तय नहीं....

तय है कि, रात के बाद
आती है एक सुबह
पर हर रात की , एक सुबह हो,
ये तय नहीं....

तय है कि, पानी भाप होकर
बन जाता है बादल
पर उमड़-घुमड़ कर यहीं आ बरसे  
ये तय नहीं....

तय है कि, बिन आँखों के
नज़ारा दिख नहीं सकता
पर आंखों से सब दिख जाएगा
ये तय नहीं ....

तय है कि, ज़िंदगी पूरी हो
तो आ जाती है मौत,
पर मौत से पहले मौत ही ना हो
ये तय नहीं ....

तय है कि, ज़िंदगी पूरी हो
तो आ जाती है मौत,
पर मौत होने से कोई मर ही जाए
ये तय नहीं ....

तय है कि, मेहनत का फल
मीठा होता है
पर हर मेहनत का फल निकले
ये तय नहीं...

ये तय है कि, प्यार भरी हर अदा
खूबसूरत होती है
पर खूबसूरत अदा प्यार ही होगी  

ये तय नहीं ...
...........रजनीश (20.06.2013)

Monday, April 1, 2013

कुछ ...

















पहाड़ों से निकलकर पानी
जमीन पर पूरा नहीं पहुंचता
नीचे आते-आते पी जाती
पानी जड़ें पेड़ों की कुछ
और फंसी हुई टीस की तरह
रहता जमा गड्ढों में कुछ

बोया पूरा वो नहीं है मिलता
चुग जाती है चिड़िया कुछ
तपती दुपहरी ख़्वाब अधूरे
खिलता हुआ सूख जाता कुछ 
हर बीज नहीं बनता है पौधा
मरतीं जैसे उम्मीदें कुछ

घटती जाती पैसों की कीमत
कम होता जाता पैसे में कुछ
कोई पहुँच न पाता मंज़िल तक
थक जाता अंदर पहले ही कुछ
कोई पहुँचता मंज़िलों पर अधूरा  
क्यूंकि रह जाता है पीछे कुछ

है घटता रहता कम होता जाता 
ना मिलता पूरा वापस कुछ
हाँ ,द्वेष बांटे से बढ़ता जाता
पर कटता जाता है भीतर कुछ  
बस प्यार ही ऐसा जग में जिसमें
खोकर सब भी रह जाता कुछ ...
.....रजनीश (01.04.2013)

Sunday, March 3, 2013

खेल इंसान का


राह तो बस राह है 
उसे आसां या मुश्किल बनाना  
इंसान का खेल है 

तकदीर तो बस तकदीर  है 
उसे बिगाड़ना या  बनाना 
इंसान का खेल है

पत्थर  तो बस पत्थर  है 
पत्थर को भगवान बनाना 
इंसान का खेल है 

फूल तो बस फूल है 
फूल  सेज़ या सिर पर चढ़ाना  
इंसान  का खेल है 

यार तो बस यार हैं 
यार को जात  रंग में ढालना 
इंसान का खेल है 

चाहत तो बस चाहत है 
उसे प्यार या नफ़रत बनाना 
इंसान का खेल है 

दीवारें तो बस दीवारें हैं 
उनसे घर या कैदखाने बनाना 
इंसान का खेल है 

आग तो बस आग है 
आग में जलना जलाना 
इंसान का खेल है 

पैसे तो बस पैसे हैं 
उन्हें कौड़ी या खुदा बनाना 
इंसान का खेल है 

धरती तो बस धरती है 
इसे ज़न्नत या जहन्नुम बनाना 
इंसान का खेल है 

इंसान तो बस इंसान है 
उसे हिन्दू या मुसलमान बनाना 
इंसान का खेल है 

......रजनीश (03.03.2013)

Monday, January 16, 2012

नज़रें प्यार भरी


तुम्हें देख सकता  हूँ 
तुम्हें सुन सकता हूँ 
महसूस कर सकता हूँ तुम्हें 
तुम्हें छू सकता हूँ 
तुम्हें बसा सकता हूँ दिल में 

पर समझ नहीं सकता तुम्हें 
तुम्हें जान नहीं सकता पूरा 

क्यूंकि कभी हृदय आड़े आता है 
या फिर कभी ये मस्तिष्क 
कुछ  सीमाएं हैं मेरी भी समझ की 
कुछ तुम हो अव्यक्त 
कुछ हिस्सा तुम्हारा अदृश्य 
तुम्हारे कुछ कंपनों का 
आभास ही नहीं होता

पर क्या ये जरूरी है 
कि हो कुछ उस जीती जागती 
तस्वीर के अलावा भी
जो मैं देखता हूँ , छूता  हूँ , महसूस करता हूँ 

क्या होता गर सब कुछ पता होता 
मैं सब कुछ जान लेता 
खुद को भी और तुम्हें भी 
पूरा का पूरा पहचान लेता 

तुम्हारे प्यार के एहसास के लिए 
दिल पर विश्वास करता हूँ 
तुम्हारी आँखों में 
प्रेम का छलकता सागर देखता हूँ 
और सब कुछ प्रेम मय पाता हूँ 

गर सब कुछ जान जाता तो 
पता नहीं प्यार की क्या परिभाषा होती 
गहराई में उतरना  और मोती ढूँढना 
शायद दूर ले जाए खुद से भी 
क्यूंकि खोज तो अनंत होती है 
अहसासों से परे ...
सच की परतें उधेड़ते
भ्रम और प्रश्नों की 
कई और दीवारें
 खड़ी होती चली जाती हैं 

और यात्रा तारों से भी 
दूर की हो जाती है ...

चलो फूल को फूल ही रहने दें 
उसकी पंखुड़ियाँ तोड़ 
सुंदरता ना तलाशें 
आओ स्वीकारें एक दूसरे को 
बिलकुल वैसा और जितना 
 हम समझते हैं 

मैं नहीं देख सकता पूरा-पूरा 
मैं झांक भविष्य के घर में 
पहचान नहीं सकता कल की तस्वीर 
शायद इसीलिए कि 
एहसास जिंदा रहें 
और ज़िंदगी में हो 
रोमांच और दिलचस्पी 

इसीलिए छोड़ दो विश्लेषण 
प्यार के मोती पिरो लो 
विश्वास के धागे में 
देखो प्यार भरी नजरों से
हर तरफ फैला हुआ प्यार 
और हर पल में बसे 
आनंद को जी लो 
जी भर के ....
....रजनीश ( 16.01.2012)

Friday, January 13, 2012

एक बूंद


ओस की इक बूंद 
जमकर घास पर, 
सुबह -सुबह 
मोती हो गई,  

ठंड की चादर ने 
दिया था उसे ठहराव 
कुछ पलों का, 
 फिर वो बूंद
सूरज की किरणों 
पर बैठ उड़ गई, 

छोड़कर घास की हथेली पर
एक मीठा अहसास
कह अलविदा 
 हवा में खो गई,

कुछ पलों का जीवन 
और दिल पर ताजगी भरी 
नमकीन अमिट छाप 
 एक बूंद छोड़ गई ...

घास पर उंगली फिरा 
महसूस करता हूँ 
उस बूंद का वजूद
जो भाप हो गई ...
...............................

एक बूंद में होता है सागर 
बूंदों से  दरिया बनता है 
बूंदों से बनती है बरखा
बूंद - बूंद शहद बनता है 
  
भरा होता है एक बूंद में  
दर्द जमाने भर का 
इकट्ठी होती  है खुशी बूंद-बूंद 
बूंद बूंद शराब बनती है 

प्यार की इक बूंद का नशा उतरता नहीं
इक बूंद सर से पैर भिगो देती है 
कहानी ख़त्म कर देती  है एक बूंद
एक बूंद ज़िंदगी बना देती है 
...
बूंद-बूंद चखो जाम ज़िंदगी का 
बूंद-बूंद जियो ज़िंदगी ....
...रजनीश (12.01.2012)

Friday, December 23, 2011

प्यार की राह


एक राह 
खोई सी कोहरे में 
इक राह 
कहीं छुप जाती है 
धरती पर उतर आए 
सफ़ेद बादलों के छुअन सी 
एक पदचाप सुन 
एक राह फिर  जी उठती है 
कुछ कदम 
और चले जाते हैं 
कोहरे में 
और राह फिर लौट आती है ...

एक राह 
शुरू  होती है सपनों में 
दिल से होकर जाती है 
जब-जब मिलती हैं 
आँखों से आंखे 
इस राह में कलियाँ मुसकुराती हैं ...

जब होते हैं हाथों में हाथ 
और दिल से जब 
दिल करता है बात 
इस राह में 
दौड़ते हैं कुछ जज़्बात 
पार करते मीलों के पत्थर 

एक राह रुकती नहीं 
ठहरे हुए वक्त में 
जब अपना वजूद खोता एक आगोश 
सुनता है धड़कनों के गीत 
राह नाचती है 

एक राह 
कब रात से होकर दिन
और दिन से रात में चली जाती है 
बढ़ते कदमों को
 खबर नहीं होती 

इस राह पर 
फूलों को देखा नहीं मुरझाते कभी 
तितलियाँ  नहीं सुस्ताती कभी
चाँदनी का एहसास 
सूरज की किरणों के बीच भी 
कदम -कदम पर 
राह में रहता है मौजूद 
अलसाती नहीं कोई शाम 
और खुशनुमा मौसम 
कभी बदलता नहीं 
मुसकुराते आंसू 
और पग पग पर 
बिखरे मोतियों से चमकती 
ये राह कभी थकती नहीं 

प्यार की राह 
ऐसी ही होती है ...
...रजनीश (23.12.2011)

Wednesday, December 21, 2011

प्यार भरी बातें


हो दिन या हो रात 
है प्यारा साथ तुम्हारा 
प्यार ही प्यार हो तुम
देखा प्यार तुम्हारा

बड़ी अच्छी लगती हैं 
बातें प्यार की और प्रिय.. तुम  
बड़े अच्छे लगते हैं 
ये धरती ,नदिया ये रैना और .. तुम 

इंतज़ार प्रियतम का 
बिछोह सहा ना जाए 
जो मिल जाएँ सनम 
तो फूल  भी गुनगुनाएँ 

ये सब प्यार की बातें 
ये प्यार भरी बातें 
इज़हार की बातें 
इकरार की बातें 
वफ़ादारी की दास्तान 
और बेवफाई की बातें 

प्यार भरी लाइनों को 
चाहता है पढ़ना हर कोई 
प्यार में डूबे शब्दों को 
पी लेना चाहता है हर कोई 

प्यार पर कुछ लिखा
तो शब्दों में रस घुले 
लोग पढ़ें , दाद दें 
सपनों की दुनिया में चलें 

प्यार प्रधान है जीवन हमारा 
प्यार आधार प्यार मक़सद हमारा 
इसलिए अच्छी लगें बातें प्यार की
करो प्यार, ना मिलेगी ज़िंदगी दोबारा 
...रजनीश (21.12.2011)

Wednesday, November 30, 2011

ज़िंदगी की दौड़

2011-10-30 17.08.26
शुरू होता है हर दिन
अजान की आवाज़ से
चिड़ियों की चहचहाहट
कुछ अंगड़ाइयों में
विदा होती रात से बातें
फिर धूप की दस्तक
और मंदिर के घंटे
अब लगते हैं दौड़ने
हम एक सड़क पर
जो बस कुछ देर ही सोती है
कानों में घुलता
सुबह का संगीत
कब शोर में बदल जाता है
पता ही नहीं चलता

सूरज के साथ
होती है एक दौड़
और दिनभर बटोरते हैं हम
कुछ चोटें, कुछ उम्मीदें
कुछ अपने टूटे हिस्से
और कुछ चीजें  सपनों की खातिर
पर साथ  इकठ्ठा होता ढेर सारा
बेवजह कचरा और तकलीफ़ें
जो  दौड़ देती है हमें
ये कीमत है जो चुकानी पड़ती है
दौड़ में बने रहने के लिए
एक  अंधी दौड़ 
एक मशीनी कारोबार
एक नशा
जो पैदा होता है
एक सपने की कोख में
और फिर उसे ही खाने लगता है
दौड़ में हमेशा सूरज जीतता है
कूद कर जल्दी से पहुँच जाता है
पहाड़ के पीछे
और जब हम पहुँचते है अपने घर
हाँफते-हाँफते और खुद को बटोरते
दरवाजे पर रात मिलती है
खुद को पलंग पर
पटक कर कब सो जाते हैं
कब खो जाते हैं
पता ही नहीं चलता ...

बहुत थका देता है सूरज ....
सूरज तो कभी नहीं कहता
दौड़ो  मेरे साथ,
तो क्या लालच..
नहीं वो तो बीच रास्ते मेँ
साथ हो लेती है,
दरअसल हमें प्यार दौड़ता है ...
...रजनीश (30.11.2011 )
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....