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Thursday, January 1, 2015

नया वर्ष नई कविता

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नए वर्ष में नई उमंगे
नए गीत नई खुशियाँ बरसे
नई मंज़िलें नए रास्ते
कदम कदम मन सबका हरसे

सपने हो जाएँ साकार
सफलता के नव द्वार खुलें
मिट जाए अंधकार
चहुं ओर प्रेम के दीप जलें

नए वर्ष में नए तराने
सभी हृदय एक ताल में थिरकें
गुनगुनाएँ खुशियों के गाने
बढ़े चलें सब साथ में मिलके

आशाओं को दें जीवन
पाएँ रिश्तों में ऊँचाइयाँ मिलके
जो बीत गई सो बात गई
जो खोया उससे सीखें मिलके

नए बर्ष में नई उमंगे
नए गीत नई खुशियाँ बरसे
नया जोश और नई तरंगे
कोई हृदय ना प्यासा तरसे ....
..... रजनीश (01.01.2015)
नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ ....

Saturday, March 3, 2012

प्रेम के कुछ सिद्धांत

करती है हर चीज़
अपनी अवस्था में
रहने का प्रयास
कोशिश वजूद बनाए रखने की
प्रेम में रहने से हृदय प्रेममय ही रहेगा

होती है चलने की गति
लगते हुए बल की समानुपाती
जितनी होगी ढलान
उतना ही तेज उतरती गाड़ी
अपनापन बढ़ाओ प्रेम भी बढ़ेगा

ऊर्जा अमर है
उसका मान है स्थिर
कर नहीं सकते उसे
ख़त्म या पैदा ...
बस बदल सकता है उसका रूप
घृणा कम करो प्रेम का दायरा बढ़ेगा

धकेलने से सरल होता है खींचना
दूर करने से आसान है पास लाना
प्रेम देने से बड़ा है
प्रेम स्वीकार करना
प्रेम ग्रहण करने से प्रेम बढ़ेगा
......रजनीश (03.03.2012) 

Monday, January 16, 2012

नज़रें प्यार भरी


तुम्हें देख सकता  हूँ 
तुम्हें सुन सकता हूँ 
महसूस कर सकता हूँ तुम्हें 
तुम्हें छू सकता हूँ 
तुम्हें बसा सकता हूँ दिल में 

पर समझ नहीं सकता तुम्हें 
तुम्हें जान नहीं सकता पूरा 

क्यूंकि कभी हृदय आड़े आता है 
या फिर कभी ये मस्तिष्क 
कुछ  सीमाएं हैं मेरी भी समझ की 
कुछ तुम हो अव्यक्त 
कुछ हिस्सा तुम्हारा अदृश्य 
तुम्हारे कुछ कंपनों का 
आभास ही नहीं होता

पर क्या ये जरूरी है 
कि हो कुछ उस जीती जागती 
तस्वीर के अलावा भी
जो मैं देखता हूँ , छूता  हूँ , महसूस करता हूँ 

क्या होता गर सब कुछ पता होता 
मैं सब कुछ जान लेता 
खुद को भी और तुम्हें भी 
पूरा का पूरा पहचान लेता 

तुम्हारे प्यार के एहसास के लिए 
दिल पर विश्वास करता हूँ 
तुम्हारी आँखों में 
प्रेम का छलकता सागर देखता हूँ 
और सब कुछ प्रेम मय पाता हूँ 

गर सब कुछ जान जाता तो 
पता नहीं प्यार की क्या परिभाषा होती 
गहराई में उतरना  और मोती ढूँढना 
शायद दूर ले जाए खुद से भी 
क्यूंकि खोज तो अनंत होती है 
अहसासों से परे ...
सच की परतें उधेड़ते
भ्रम और प्रश्नों की 
कई और दीवारें
 खड़ी होती चली जाती हैं 

और यात्रा तारों से भी 
दूर की हो जाती है ...

चलो फूल को फूल ही रहने दें 
उसकी पंखुड़ियाँ तोड़ 
सुंदरता ना तलाशें 
आओ स्वीकारें एक दूसरे को 
बिलकुल वैसा और जितना 
 हम समझते हैं 

मैं नहीं देख सकता पूरा-पूरा 
मैं झांक भविष्य के घर में 
पहचान नहीं सकता कल की तस्वीर 
शायद इसीलिए कि 
एहसास जिंदा रहें 
और ज़िंदगी में हो 
रोमांच और दिलचस्पी 

इसीलिए छोड़ दो विश्लेषण 
प्यार के मोती पिरो लो 
विश्वास के धागे में 
देखो प्यार भरी नजरों से
हर तरफ फैला हुआ प्यार 
और हर पल में बसे 
आनंद को जी लो 
जी भर के ....
....रजनीश ( 16.01.2012)

Wednesday, August 3, 2011

हस्तरेखाएँ




















रेखा -ओ- रेखा ,
मैंने तुझको देखा......
तू धारा है इक नदिया की
निकली तू मणिबंध से
और पहुँच गयी अनामिका तक-  पर  है क्यूँ  तू कटी-फटी ?

रेखा-ओ-रेखा ,
मैंने तुझको देखा..............
तू है इक पगडंडी -
गुरु पर्वत की तलहटी से 
लगाती शुक्र के घर का  चक्कर
पूरी जमीन पार कर गई-    पर कितना हूँ जिंदा मैं  ?

रेखा-ओ-रेखा
मैंने तुझको देखा......
तू  लकीर है एक जख्म की
देख तुझे  लगता है जैसे ,
 हृदय पर तू   कटार से खिंची
तुझमें हंसने रोने का हिसाब है, तू धड़कती क्यूँ नहीं ? 

रेखा-ओ-रेखा
मैंने तुझको देखा....
तू तो रेल की पटरी लगती
बना रखा है इक सम अंतर ,
दिल तक जाती रेखा से
बताओ  तुम पर ही चलूँ या  गुजरूँ बगल के रस्ते से?

रेखा-ओ-रेखा
मैंने तुझको देखा .....
जैसे लाइन खिचीं कागज पर ...
नहीं थी  कल  तू  यहाँ
आज इधर चली आई  है  ?
मैंने नहीं  बुलाया  फिर  यहाँ तू  क्यूँ  निकल आई है  ?

रेखा-ओ-रेखा
मैंने तुझको देखा ......
तू है  रेत का समंदर,
अपने कदमों की छाप देखता हूँ तुम पर  
पर एक छोर तेरा अब तक कोरा ...
गर पहुंचूँ  उस छोर तक तो वहाँ  क्या तू मिलेगी ?

रेखा-ओ-रेखा
मैंने तुझको देखा
किसने खींचा है तुझे ,
बना रही  तू जाल मिल  रेखाओं से
 समझती है  क्या मैं तुझे  मिटा न पाऊँगा
 कर ले खड़े अवरोध मैं तो पार निकाल कर जाऊंगा

( भाग्य , हृदय, मष्तिस्क , और शक्ति से मिलकर बना हमारा जीवन ...हाथ पर बनी रेखाएँ इन्हें इंगित करती हैं -(हृदय रेखा, मष्तिस्क रेखा , भाग्य रेखा ,जीवन रेखा और भी ढेर सारी रेखाएँ ),पामिस्ट कहते हैं ऐसा ...इन्हीं हस्तरेखाओं पर हुआ लिखने का मन तो ये कविता बनी ...
......रजनीश (28.12.2010)

Monday, February 14, 2011

प्रेम

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तुम कहो  जो ,चाँद-तारे
इस धरा पर तोड़ लाऊं ,
है असंभव ये , कहो तो,
सर्वस्व अपना मैं लुटाऊँ ...

अनुभूत कर सकते तभी,
जब पथ पर चलने तुम लगो ,
हृदय ये मेरा ,  पथ है वो,
आओ, चलो , खुद से मिलो ...

प्रेम होता स्व को खोकर ,
दूसरा बन जाओ तभी ,
मैं नहीं हूँ , तुम हूँ मैं;
क्षण भर को तो, देखो कभी...

खुद को खो दो, प्रेम पा लो,
प्रत्येक कण में प्रेम है ,
अप्रेम जैसा कुछ नहीं ,
शाश्वत, जगत में प्रेम है ...

हृदय होते नहीं है पूरक,
वे स्वयं सम्पूर्ण हैं,
जब पूर्ण  मिलता पूर्ण में ,
तब प्रेम होता पूर्ण है...

.........रजनीश (14.02.2011)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....