एक नज़्म लिखी थी
उस पन्ने पर
जो दिल में
कोरा पड़ा था
पर कुछ शब्द
नहीं थे पास मेरे
कुछ लाइनें अहसासों में
अटक गईं थीं
लिखते लिखते ही
पन्ना गुम
गया था रद्दी में
कलम भी खो गई थी
हिसाब-किताब में
पलाश फिर दिखा
खिड़की से
रद्दी से फिर
हाथ आ गया
वही पन्ना
उस नज़्म के दिन
लौट आए हैं ...
रजनीश (13.02.2012)