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Monday, February 13, 2012

एक नज़्म की कहानी

एक नज़्म लिखी थी 
उस पन्ने पर 
जो दिल में 
कोरा पड़ा था 
पर कुछ शब्द 
नहीं थे पास मेरे 
कुछ लाइनें अहसासों में 
अटक गईं थीं 
लिखते लिखते ही 
पन्ना गुम 
गया था रद्दी में 
कलम भी खो गई थी 
हिसाब-किताब में 

पलाश फिर दिखा 
खिड़की से 
रद्दी से फिर 
हाथ आ गया
वही पन्ना 
उस नज़्म के दिन 
लौट आए हैं ... 
रजनीश (13.02.2012)

Wednesday, September 28, 2011

एक गीली नज़्म

021209 022
कई बार की थी
कोशिश कि पढ़ सकूँ 
उनकी आँखों में लिखी
एक नज़्म
पर नज़रें हर बार
बस देख सकीं 
उन शब्दों की सूरत
और पढ्ना ही ना हुआ
वो नज़्म आज भी
रहती है मेरे सिरहाने
पर जो लिखा  है
कभी पढ़ा ना गया
पहचान ना सका शब्दों को
हाँ  जब भी छुआ उन्हें
वो नम ही मिले हमेशा
और उनके  पार मिली
वही आँखें
वो कागज़ भी कभी
पुराना ना हुआ
...रजनीश (28.09.11)

Thursday, February 17, 2011

दृष्टिभ्रम

mysnaps_diwali 161
कंपकंपाते होठों पर 
अटके से थे शब्द कुछ ...
हवा से हिलते केश में,
ढँका मानो आमंत्रण...
कांपते हाथों में,
फंसी थी एक पाती...
झुकी पलकों में ,
छुपा सा लगा समर्पण ...
उकेरता था पाँव, कुछ वृत्त ,
उसने, लगा सब कुछ कहा था ,
पर, था छुपाता दरअसल वो एक मोती,
जो बचा नज़रें वहीं, पलक से गिरा था ....
हाथ में उसके सिर्फ एक नज़्म थी,
जिसमें कुछ नहीं बस अलविदा लिखा था...
...............रजनीश (16.02.2011)
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