[1]
जो चीजें थीं कभी सस्ती
होती जा रही हैं वो महँगी
जो कभी होती थीं अनमोल
गली-गली बिकती हैं सस्ते में...
[2]
घड़ी तो अब भी है गोल
गति भी नहीं बदली उसकी
फिर उसी दायरे में चलते-चलते
समय कैसे कहाँ कम हो गया ?
[3]
दिन में तेज धूप , धूल भरी आँधी
और शाम को बदस्तूर बारिश
दिन भर एक ही मौसम से ...
जैसे कायनात ऊब सी गई है
[4]
एक , फिर वापस आने चले गए
और एक फिर से वापस आ गए
खून हमारा जला ,वोट हमने दिया
और हम वहीं के वहीं रह गए ...
[5]
बनाया टीवी और अखबार
ताकि कन्फ़्यूज़ ना हो हम यार
ये पल पल कर चीत्कार बताएं
हमको , नरक है सब संसार ...
...रजनीश (16.05.11)