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Saturday, March 24, 2012

पलाश .. एक बार फिर


पलाश
इस साल भी
दिख जाते हैं
हर रोज बिलकुल वहीं
जहां वो थे पिछले साल भी
बिलकुल वही रंग
पर मेरी आँखों पर
कोई पर्दा है
नज़र खोई रहती है कहीं

पलाश के फूलों
की पुकार भी
टकराती हैं आकर
 झकझोरती हैं
मुझे कई बार
पर मैं अनसुनी कर
चलता ही रहता हूँ
गूंजता रहता है
एक नया शोर भीतर

इस साल
चाल भी मेरी
कुछ बदली सी है
एक बार रुका भी
मैं पलाश के सामने
वो एक धुंधली मीठी याद सा
मेरे सामने कहता रहा
पहचानो मुझे ...!

मैं पलटता रहा
यादों के पन्ने
और किताब में
दबे एक पुराने फूल
से पहचाना उसे
बस कुछ पल ही रुके थे
मेरे कदम
उसके करीब और
वक़्त फिर खींच
ले गया मुझे

पिछले साल ही
पलाश को देखते-देखते
रास्ता  गुम जाता था
और अब मैं ही
गुम गया हूँ
रास्ते में ..
.......रजनीश (24.03.12)

Monday, February 13, 2012

एक नज़्म की कहानी

एक नज़्म लिखी थी 
उस पन्ने पर 
जो दिल में 
कोरा पड़ा था 
पर कुछ शब्द 
नहीं थे पास मेरे 
कुछ लाइनें अहसासों में 
अटक गईं थीं 
लिखते लिखते ही 
पन्ना गुम 
गया था रद्दी में 
कलम भी खो गई थी 
हिसाब-किताब में 

पलाश फिर दिखा 
खिड़की से 
रद्दी से फिर 
हाथ आ गया
वही पन्ना 
उस नज़्म के दिन 
लौट आए हैं ... 
रजनीश (13.02.2012)
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