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Sunday, October 20, 2013

तूफ़ान

(1)

तूफान का इंतज़ार
किया कुछ दिनों
की बचने की तैयारी

मचा तबाही चला भी गया
अब फिर बसने की बारी

सीखा था ज़ख़्मों से
कुछ बदलने की थी ललक
कुछ मिले हाथ से हाथ
इसलिए तकदीर ने दिया साथ

बच गई कई जाने
बच गए कई घर
बची ज़िंदगी बेचारी

गर हो हौसला दिल में
तूफ़ान से टकरा जाएँ
ले सकते हैं लोहा उससे
गर पहले से हो तैयारी

(2)

हर तूफ़ान
बता कर नहीं आता
आहट भी नहीं होती कई बार
कभी होता है अंदेशा
कि पूरब से आयेगा
और सामने आ खड़ा होता है
एक तूफ़ान पश्चिम से

ऐसे भी तूफ़ान है
जिनसे हुई तबाही दिखती नहीं
कभी हवा का  झोंका ही लगते
पर जड़ें हिला कर चले जाते हैं
एक तूफ़ान आता भी है बताकर
तो बिना बताए ही चला जाता
एक आता है तो कभी जाने का
नामही  नहीं लेता
वहीं वहीं घूम कर बरसता
और तबाही मचाता है
जैसे बैर हो कई जन्मों का

कभी तो तूफानों की बारिश हो जाती है
आदत से  बन जाते हैं तूफ़ान
लगता है जैसे किसी तूफ़ान से गुजरा हूँ
और कर रहा हूँ किसी तूफ़ान का इंतज़ार
दो तूफानों के अंतराल में
कोशिश एक को भुलाने
और दूसरे से बचने की
कभी मैं जाता हूँ तूफ़ान की तरफ
कभी वो आता है मेरे पास
पराये तूफानों ने भी
तोड़ी मेरी दीवारें कई बार

ज़िंदगी में तूफ़ान कम नहीं
हथेलियों की लकीरों से
कई चक्रवात कई तूफ़ान उठते है
कई तूफ़ान किताबों में
कुछ मेज की दरारों में
कुछ साँसों में
कुछ धड़कनों मे
कुछ दिल की गहराइयों में
गोते लगाते
कुछ आँखों में उमड़ते

गुजरे तूफानों के जख्म
पेड़ों की तरह उग आते है
दिल की दीवारों पर
उनकी तस्वीरें सिरहाने पड़ी रहती है
तूफानों की आत्मकथा हूँ मैं

हवा है
तो सांस  है
सांस है
तो गति है
गति है
तो तूफ़ान है
तूफ़ान हैं
तो शांति है
जिसे पाने का नाम
ज़िंदगी है ....
रजनीश ( 20.10.2013)
साइक्लोन फैलिन पर 

Tuesday, May 21, 2013

एक पल की दास्ताँ

एक पल
वैसा ही था
जैसे और भी पल थे
पर वो था बिलकुल काला
बाकी श्वेत धवल थे

उस पल का चेहरा
कितना घिनौना
कितना वीभत्स
कितना डरावना
न सुनी किसी ने
उस पल की आहट
न आया  नज़र
घात लगाए कतार में
ना भाँप सका
कोई आता हुआ संकट

पल छुपा रहा
फिर फट पड़ा
एक भारी पल
धमाके  संग गिरा
शोलों में बिखर
फट गया पल
कई ज़िंदगियों के
ख़त्म हुए पल

उस एक पल ने क्रूर होकर
कुछ यूं कर दिया तमाशा
हो गए सब पल अशांत
बदल गई पलों की भाषा
खो गई सब  मुस्कुराहटें
ख़त्म हो गईं पलों की आशा

क्यूँ आया था
वो पल छुपकर
पलों की खुशनुमा किताब में
काला पन्ना क्यूँ जोड़ गया
क्यूँ किया बदरंग उसने
क्यूँ बिगाड़ी तस्वीर सुंदर
पलों का संगीत मधुर
वो  बेसुरा क्यूँ कर गया

उस विनाशकारी पल का
एक टुकड़ा सिसकता मिला
कहा मैं था और पलों जैसा
मुझे संहार से क्या मिला
मुझे भ्रमित किया किसीने
आँखों पर पट्टी थी बांधी जिसने

किसने चढ़ाया था उस पर
विध्वंस का दुष्ट आवरण
किसने भर दिया उस पल में
आतंक का घातक जहर
अपने जैसे पलों का उसे
किसने बना दिया  दुश्मन

था पल के टुकड़े का जवाब
कैसे भूल सकूँगा जनाब
सौंपते खंजर मुझे वो
तुम ही थे पहने नकाब

हम कहते खुद को इंसान
और हैं इंसानियत के दुश्मन
न हम अपना खून पहचानते
न सुनते इंसानियत का क्रंदन

मिटा दो आतंक के साये
इंसानियत को आबाद कर दो
जी सकें खुल कर सभी
इन पलों को आज़ाद कर दो

.......... रजनीश (21.05.2013) 
21st May : Anti Terrorism Day पर विशेष 
It was on this day in 1991 that former Prime Minister 
Rajiv Gandhi was assassinated. 
The objective behind the observance of Anti-Terrorism Day 
is to wean away the people from terrorism and violence.

Tuesday, March 15, 2011

कंपन

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धरती काँपती है ,
हर तरफ होता विनाश साक्षी है ।
दिन में ,
कुछ पलों के लिए
मैं  भी जमीन पर होता हूँ,
पर कभी महसूस नहीं हुआ,
जमीन का तनाव, वो कंपन ।
कल कान लगाकर
सुनने  की कोशिश की
धरती की धड़कन,
बस अपनी ही ध्वनि सुन सका ।
पर, शांति के इस समुद्र का  तल
अशांत पत्थरों का घर क्यूँ  है ?
धरती  अधूरी है अभी ,
अजन्मी, अर्धविकसित,  
तभी तो भीतर ये हलचल है ।
कुछ अभी तक अधूरा ।
क्यों ,मेरे अंदर भी
ढेर सारा और दबा हुआ
लावा है ?  क्यूंकि मैं भी
इसी धरती का पुत्र हूँ ?
इसका अंश , पूरा-पूरा धरती जैसा ,
मैं भी तो अभी गर्भ में हूँ ।
उसी अधूरेपन, उसी अपूर्णता
का रोपण इसकी छाती
पर भी करता हूँ ।
अपनी दुनिया बसाता हूँ,
एक अस्थिर नींव पर
अधूरा, अशक्त मकान  बनाता हूँ
और करता रहता हूँ असफल कोशिश
अपनी नश्वरता को पोषित
करने की इस घर में ।
बस एक आशा है ..
जब धरती  बन जाएगी पूरी,
तब  नदी  कभी गांव में नहीं आएगी,
सागर तांडव नहीं करेगा ,
झील गुम नहीं होगी,
पहाड़ चलना बंद कर देंगे,
हरी-हरी  चादर को नहीं जलाएगा लावा,
कोई घर भी नहीं टूटेगा,
और फिर मेरा जन्म होगा ,
एक शांत, संतुष्ट और सम्पूर्ण मैं ...
..रजनीश (15.03.2011)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....