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Monday, May 28, 2018

घड़ी की टिक-टिक


वक्त गुजरता जाता है
समय बदलता जाता है
इक पल आता
इक पल जाता
पल दर पल मंजर बदलता
संसार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो मैं था
वो अब मैं नहीं
जो तुम थे
वो अब तुम नही
पल दर पल बदलते धागे
करार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो कोपल थी
अब पौधा है
जो पौधा था
अब दरख्त है
धरती पर दिन रात बदलते
और उसका श्रृंगार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो बूंद में था
अब दरिया में
जो दरिया में
अब सागर में
सागर से बादल में जा
कहीं और बरसता जाता है
समय बदलता जाता है

ना सूरज वही
ना चांँद वही
ना धरती और ब्रम्हांड वही
संग घड़ी की टिक-टिक
कण-कण का रुप आकार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है..
                   ....रजनीश (28.05.18)
   

Tuesday, May 17, 2011

आप बीती

DSC00206
[1]
जो चीजें थीं कभी सस्ती
होती जा रही हैं वो महँगी
जो कभी  होती थीं अनमोल
गली-गली  बिकती हैं  सस्ते में...
[2]
घड़ी तो अब भी है गोल
गति भी नहीं बदली उसकी
फिर  उसी  दायरे में चलते-चलते
समय कैसे कहाँ  कम हो गया ?
[3]
दिन में तेज धूप , धूल भरी आँधी
और शाम को बदस्तूर बारिश
दिन भर एक ही मौसम से ...
जैसे  कायनात ऊब सी गई है
[4]
एक , फिर वापस आने चले गए
और एक फिर से वापस आ गए
खून हमारा जला ,वोट हमने दिया
और हम वहीं के वहीं रह गए ...
[5]
बनाया टीवी और अखबार
ताकि कन्फ़्यूज़ ना हो हम यार
ये पल पल कर  चीत्कार बताएं
हमको ,  नरक है सब संसार ...
...रजनीश (16.05.11)
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