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Sunday, September 27, 2020

कलम और वायरस

क्यूं नहीं लिखता आजकल ?
यही सोच रहा हूं 
इन दिनों 
कलम चलते चलते रुक जाती है
खो जाता है लिखने का जज्बा कहीं
खयाल ही खो जाते हैं
एक अजीब सा ठहराव 

जिंदगी तो वैसे ही चल रही है 
जैसे पहले थी 
पर इसके हर रंग  पर 
एक बदरंग परत चढ़ गई है 
हर स्वाद में एक कसैलापन आ गया है
जिंदगी के हर रस्ते में 
हर मोड़ पे , हर चौराहे में  
एक जैसे पत्थर बिखरे पड़े हैं 
हर भाव , हर जज्बात 
एक जगह पर जा के रुक जाते हैं 

वायरस के इस वक्त में 
जिंदगी का मतलब 
वायरस की बस्ती से 
बस किसी तरह बच के निकलना,  हो गया है
जैसे यही एक मकसद है जिंदगी का 

पर बहुत से ऐसे भी हैं 
जिनके लिए पेट और छत का सवाल आज भी है
और वो अपने आप को दांव पर 
आज भी लगा रहे हैं 
अपने पेट के लिए 
भूख हरा देती है वायरस के डर को
मजबूरी और जरूरतों का वायरस 
खतरनाक है कोरोना से भी 

गौर से देखता हूं तो
जिंदगी दिखती है 
अब भी चलते 
जिंदगी के रंग अब भी जिंदा हैं 
पत्थर हैं तो रस्ते भी हैं 
जिंदगी रुकी नहीं 
जिंदगी रुकती नहीं 
फिर कलम क्यूं रुके ?
तो चलने लगती है 
कागज के टुकड़े पर 

साथ जिंदगी के 
लिखना जारी रहेगा बदस्तूर 

…........रजनीश (२७.०९.२०२०, रविवार)




Tuesday, January 31, 2012

एक उपेक्षित


कई बार सोचा 
कुछ पल बतिया लें 
अपनी कलम से 
और दिल की दीवारों 
पर कहानियाँ बुनती तस्वीरों को 
इन पन्नों पर उतार लाएँ 

पर झोली में 
वक्त का कोई टुकड़ा नहीं मिला 
जो इन तस्वीरों के नाम कर दें 
भागती हुई इस ज़िंदगी में 
कोई ऐसा मुकाम भी नहीं 
जहां ठहर अपने दिल को थाम लें 
 उसकी धक-धक सुनें
दिल को गले लगाएँ 

भागते रहते हैं हर दम 
साँस फूलने पर ही रुकते हैं 
 खुद से भागते भागते
 फूलती साँसों में 
उन तस्वीरों को साफ कर लेते हैं 
कभी काँच बदला कभी डोर सीधी की 
कभी तस्वीर की तारीख़ फिर से लिखी 
कभी बस एक नज़र भर देख लिया 

इतना वक्त नहीं कि 
तस्वीरों को  गोद में लेकर बैठें
उनसे  कुछ बातें  करें
जब-जब जोड़ते हैं कुछ पल 
चुरा कर यहाँ-वहाँ से 
हमें दुनियादारी उठा ले जाती है 
और  कलम की स्याही
एक कैद में बंद 
बस सूखती चली जाती है....
रजनीश (31.01.2012)
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