[1] ठंड का मौसम
छोटे हो गए दिन अब लंबी ठंडी रातें
एक साल की बिदाई नए साल की बातें
[2] प्रदूषण और सम विषम
बारह बजने को हुए रात , बॉर्डर दिल्ली का किया पार
अब करना कार से वापस घुसने दिनभर का तुम इंतज़ार
[3] प्रदूषण और सम विषम
तुम्हारी कार सम और मेरी है विषम, आज चलूँ मैं कल चलो तुम
इस आज-कल में थोड़ा भ्रम थोड़ा गम ,क्या होगा प्रदूषण कम
[4] प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग
मत उड़ा हर फिक्र को तू धुएँ में मेरे यार
खतरा है ग्लोबल-वॉर्मिंग का बन जा समझदार
[5] फ्रांस
दहली फिर मानवता देखो धमाकों और चीत्कारों से
मिट न सकेंगे ये धब्बे काले दिल की रोती दीवारों से
.......रजनीश ( 12.12.15)
सुबह की मंद बयार में
ओस के बिछौने पे खड़े होकर
कोमल पंखुड़ियों से छनकर आती
मीठी धूप में नहाना
कितना अच्छा लगता है
और यही धूप पेड़ों के सहारे
जब ऊपर चढ़ती और बढ़ती है
कसैली हो जाती है
झुलसाने लगती है
वक्त की आंच के मानिंद
...
लू के थपेड़ों में
घने दरख्त की ठंडी छाँव
जुल्फों के साये का सुकून देती हैं
गुलाबी ठंड में हो जाती है
धीमी कुछ आंच जख्मों की
पर पहाड़ों से उतरते-उतरते
ये ठंड काली हो जाती है
हड्डियाँ कंपा देती है
और खून जमा देती है
दब जाती है ज़िंदगी
बर्फ की मोटी परतों के तले
....
माँ की तरह
ढेर सारा पानी लिए
बरसते हैं बादल
प्यासी धरती की खातिर
सींच देते हैं जमीन
फुहारें ले आतीं हैं
चाहतों का मौसम
सपनों की बारिश का आलम
और कभी बरसते-बरसते
इतना बरस जाते हैं बादल
कि आ जाता है सैलाब
जो डुबो कर सब कुछ
बहा ले जाता है सारे सपने
....
और ऐसा ही कुछ
प्यार के साथ भी है ...
......रजनीश (23.10.2013)
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
चढ़ गई एक और परत
वक़्त की हर तरफ़
कुछ सूख गए पेड़ों और
कुछ नई लटकती बेलों में
बस कुछ खट्टी मीठी यादें
बाकी सब , पहले जैसा ही हाल
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
एक बारिश सुकून की
धो गई कुछ ज़ख़्म इस बरस
कुछ अरमान ठिठुरते रहे
कड़कड़ाती ठंड में सहमे
चढ़ते उतरते रहे मौसम के रंग
जवाबों में फिर मिले कुछ सवाल
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
....रजनीश (16.12.2012)

बुझ गई धरा की प्यास
खुश हुईं सारी नदियां भी
लहलहा उठे हैं सब खेत
देखो तनी है छाती पेड़ों की
गुम चुकी है बदरिया अब
भिगा धरती का हर छोर
फिर दौड़ने लगा है सूरज
सींचता प्यारी धूप चहुं ओर
छोटे हो चले अब दिन
अब होंगी लंबी रातें
निकाल लो अब रजाइयाँ
दुबक कर करना उसमें बातें
हैं ये दिन त्योहारों के
बन रही है मिठाइयाँ
रोशन दिये से होंगी रातें
चल रही है तैयारियां
कोई डरता अब के बरस भी
फिर से सिहर कर काँप उठता
हैं पास न छत न उसके कपड़े
बचने की वो भी कोशिश करता
बर्फ सजाएगी पहाड़ों को अब
गहरी झीलें भी जम जाएंगी
सुबह मिलेंगीं ओस की बूंदें
साँसे भी अब दिख जाएंगी
वादियाँ ओढ़ती हैं एक लिहाफ
दुनिया कोहरे में छुप जाती है
लो ख़त्म हुई इंतज़ार की घड़ियाँ
इठलाती हुई ठंड आती है ...
.....रजनीश ( 21.10.2011)
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