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Thursday, June 6, 2013

कार्बन फुट-प्रिंट और फूड-प्रिंट

1. कार्बन फुट-प्रिंट 
चलते रहने का नाम है ज़िंदगी  
एक रास्ते पर चलने का सिलसिला
हर कदम पर एक नई चुनौती
हर मील के पत्थर पर लिखी एक दास्तान
बढ़ते कदम छोडते हैं
धूल की चादर पर
एक इतिहास
एक छाप

जंगलों को काटते हुए
जब से बनाया है रास्ता
बन रही है मेरे हर कदम पर  
एक काली जहरीली छाप
एक अभिशाप
जमीन के सीने पर
मेरा कार्बन फुट-प्रिंट
जिसका कालापन
उड़कर छा जाता है 
मेरी ही आँखों पर 
सांसें भी रुँधने लगती हैं जिससे
डगमगाने लगते हैं कदम
बैठ जाता हूँ सुस्ताने लगता हूँ 
एक फटी हुई हरी चादर पर 

रास्ते को घेरे एक हरी चादर
जिस पर सिसकते हैं ज़ख्म
इतने सारे, कि हरा रंग ही हो गया मटमैला
और टुकड़े-टुकड़े चादर कुछ खो सी गई है 
अपनी जैसी ही पर एक बेजुबान ज़िंदगी की 
डगालें काट-काट कर 
कितनी वीरनियाँ बो दी हैं मैंने चारों ओर
और जहर मिला दिया है नदिया में
कि अब बादलों की आँखों से
गिरने लगा है तेज़ाब

मील के पत्थर पे सुस्ताते हुए
एक नया पौधा लगाता हूँ
धुआँ कुछ छँटता है
रास्ता कुछ साफ होता है
मैं नज़र आने लगता हूँ मुझे 
दिखने लगती है ज़िंदगी 
मेरी ज़िंदगी सीमित नहीं मेरे तक
मेरी साँसे तो उस पेड़ की हैं
जो रास्ते के किनारे 
एक हरी चादर लिए 
देता है मुझे आसरा
मेरा ही हिस्सा है वो

अपनी ही शाखें काटते-काटते
आखिर कितनी दूर जा सकूँगा मैं
फिर कुछ मोड लेता हूँ अपना रास्ता
और फिर उसी पुराने रास्ते पर आ जाता हूँ
जो कायनात ने बनाया था कभी मेरे लिए
करता हूँ कोशिश
ना भटकूँ , ना भूलूँ अपनी राह
ना उतरूँ अपने रास्ते से
ताकि कम से कम लगे कालिख
जी सकें सभी 
और कम से कम

फैलें मेरे कार्बन फुट-प्रिंट..........  

2. फूड-प्रिंट 

दाने दाने पे लिखा है खाने वालों का नाम,
पर किसी दाने पर नहीं, ऐसे भी लाखों नाम ।

जिन दीवारों के भीतर अनाज सड़ा करते हैं,
उन दीवारों के सहारे पड़े भूखे मरा करते हैं ।

चांदी की तश्तरी में वो इतनी छोडते हैं जूठन,  
एक परिवार की मिट जाए जिससे पेट की अगन ।

एक पेड़ ही लगाओ कि कम हो जाए कार्बन फुट-प्रिंट,
सोच समझ के खाओ अन्न बच जाए घटे फूड-प्रिंट ॥  
.......रजनीश ( 05.06.2013 )

World  Environment  Day , 5th  June   के अवसर  पर 
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के
 प्रति वैश्विक स्तर  पर राजनितिक और सामाजिक जागृति
 लाने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत १९७२ ई। में ५ जून से १६ जून तक
 संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलनसे हुई। 
(विकीपीडिया  से साभार)







The theme for this year’s World Environment Day celebrations is Think.Eat.Save. Think.Eat.Save is an anti-food waste and food loss campaign that encourages you to reduce your foodprint. According to the UN Food and Agriculture Organization (FAO), every year 1.3 billion tonnes of food is wasted. This is equivalent to the same amount produced in the whole of sub-Saharan Africa. At the same time, 1 in every 7 people in the world go to bed hungry and more than 20,000 children under the age of 5 die daily from hunger.  

Wednesday, April 24, 2013

कुछ यूं करके भी देख ...



















हवा में हरदम ऊंचा उड़ता  है
कभी जमीं पर चलकर देख,

फूलों का हार पहन इतराता है
कभी कांटे सर  रखकर देख,

दौलत और दावतें उड़ाता  है
कभी जूठन चखकर देख,

बस पाने की जुगत ही करता है
कभी कुछ अपना  खोकर देख,

अपनी जीत के लिए  खेलता है
कभी औरों के लिए हारकर देख,

 जो  नहीं उसके लिए ही रोता है
कभी जो संग उसके  हँसकर देख,

बस किताबें पढ़ता रहता है
कभी  चेहरों को पढ़कर देख,

औरों के रास्ते ही चलता है
कभी अपनी राह चलकर देख,

दूसरों के घर झाँकता रहता है
कभी अपने घर घुस कर देख...
......रजनीश (24.04.2013)

Sunday, June 3, 2012

गर्मी

गरम लू के थपेड़ों में
झुलस जाते हैं कुछ अरमान
भाप हो जाती हैं 
कुछ ख़्वाहिशें 
वक़्त बन जाता है 
अंगारों भरी सड़क 
जलता है फ़र्श 
और तपती हैं दीवारें 
झील सूख कर 
बन जाती है आईना 
ख़ुश्क हवा के हथौड़े 
बदन को लाल कर देते हैं 
गरम पलकों के घर 
में रहते आँसू भी सूख जाते हैं 

मर जाएँ कुछ ख्वाहिशें 
अधूरे पड़े रहें अरमान 
पर सूरज की किरणें 
झुलसा नहीं पाती 
मन की दीवारों को 
क्यूंकि वहाँ मौसम 
पर न कोई क़ाबू है 
न कोई बंधन 
कभी भी बारिश और 
कभी भी जलन  
और सूरज के कहर से 
भाप नहीं हो पाती 
पेट की भूख 
जिसके लिए 
मौसम की इस तपिश में 
हाथों को बार बार 
झुलसते देखा है 

इसीलिए किसी के लिए 
ये गर्मी है एक दर्द
और किसी के जीने का सहारा 
....रजनीश (03.06.2012)
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