Showing posts with label दुनिया. Show all posts
Showing posts with label दुनिया. Show all posts

Monday, May 28, 2018

घड़ी की टिक-टिक


वक्त गुजरता जाता है
समय बदलता जाता है
इक पल आता
इक पल जाता
पल दर पल मंजर बदलता
संसार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो मैं था
वो अब मैं नहीं
जो तुम थे
वो अब तुम नही
पल दर पल बदलते धागे
करार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो कोपल थी
अब पौधा है
जो पौधा था
अब दरख्त है
धरती पर दिन रात बदलते
और उसका श्रृंगार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है

जो बूंद में था
अब दरिया में
जो दरिया में
अब सागर में
सागर से बादल में जा
कहीं और बरसता जाता है
समय बदलता जाता है

ना सूरज वही
ना चांँद वही
ना धरती और ब्रम्हांड वही
संग घड़ी की टिक-टिक
कण-कण का रुप आकार बदलता जाता है
समय बदलता जाता है..
                   ....रजनीश (28.05.18)
   

Wednesday, July 11, 2012

दो दुनिया का वासी

मैं हूँ
दो  दुनिया  का वासी

एक जहां  है सभी असीमित
दूजे में जीवन लख-चौरासी

मैं हूँ दो  दुनिया  का वासी ...

एक जहां तुमसे मिलता हूँ
सांस जहां हर पल लेता हूँ
जिसमें मेरे रिश्ते-नाते
रोज जहां चलता फिरता हूँ

दूसरी  सपनों की है दुनिया
जिसमें मेरा मन रहता है
उसकी देखा-देखी की कोशिश
इस दुनिया में तन करता है

मैं हूँ
दो  दुनिया  का वासी ...

सपने गर अच्छे होते हैं
इस जहान में खुश रहता हूँ
दर्द वहाँ का मुझे गिराता
इस  दुनिया  में दुख सहता हूँ

जो सपनों की दुनिया में  बुनता
और यहाँ जो कुछ मिलता है
अंतर जो पाता हूँ  इनमें
वही राह फिर तय करता है 

मैं हूँ
दो  दुनिया  का वासी

एक जहां है  सपने रहते
दूजे में काबा - कासी

मैं हूँ
दो  दुनिया का वासी...
.......रजनीश ( 11.07.2012)

Monday, May 28, 2012

चेहरों का शहर














( अपनी एक पुरानी कविता पुनः पोस्ट कर रहा हूँ ....)

एक चेहरा
जो सिर्फ एक चेहरा है मेरे लिए
दिख जाता है अक्सर
जब भी पहुंचता हूँ चौराहे पर,
एक चेहरा हरदम सामने रहता है
चाहे कहीं से भी गुज़रूँ

कोई चेहरा होता है अजनबी पर
लगता जाना पहचाना,
कभी चलते चलते मिल जाता है
कुछ नई परतों के साथ
कोई चेहरा जो दोस्त था,
कभी ऐसा  चेहरा मिल जाता है
पुराना जो दोस्त न बन सका था

कोई चेहरा ऐसा जिसे मैं पसंद नहीं
कोई ऐसा जो मुझे न भाया कभी
कुछ चेहरे कभी ना बदलते और
हैं हरदम बदलते हुए चेहरे भी
चेहरों पर चढ़े चेहरे मुखौटे जैसे
चेहरों से उतरते चेहरे नकली रंगों जैसे

हर चेहरे में एक आईना है
हर चेहरा अनगिनत प्रतिबिंब है
अगर कोई और देखे तो
वही चेहरा दिखता है कुछ और
हर गली चेहरों की नदियां
हर चौराहा चेहरों का समंदर है

अंदर बनते बिगड़ते खयालात
जागते सोते जज़्बात
सभी जुड़े चेहरों से
सूनी वादियों में भी दिख जाता
कोई चेहरा
बादलों , समुंदर की लहरों ,ओस की बूंद
और आँखों से टपकते मोती में भी चेहरे

एक चेहरा दिखता आँखें बंद करने पर
( एक चेहरा नहीं दिखता आंखे खुली होने पर भी !)

मैं ही हूँ इन चेहरों मैं
तुम भी हो इन चेहरों मैं
मैं एक बूंद नहीं चेहरों की नदी हूँ
नदी ही क्यूँ समुंदर हूँ
और तुम भी

बिना चेहरों के न भूत है न भविष्य
न हर्ष है न विषाद
न कुछ सुंदर न वीभत्स
और वर्तमान भी  शून्य है
अगर चेहरे नहीं तो
  न मैं हूँ न तुम
...रजनीश (24.05.2011)

Saturday, February 25, 2012

मैं, तुम और हमारा वक़्त

तुम कहते हो जो मुकाम सफ़र में
गुजर जाते हैं वो फिर नहीं आते
पर कयामत बार-बार आती है
और दुनिया हर बार फिर से पैदा होती है
वक़्त का पहिया चलता रहता है
एक गोल घेरे में,
दुनिया की किस्मत में
वक़्त बार बार लौटता है

सुना ये भी है कि जा सकते हैं
वक़्त से आगे
और इसके पीछे भी
इसकी चाल का भी
कोई ठिकाना नहीं
कभी तेज कभी बहुत धीमा
मेरे कुछ पलों में
तुम्हारे बरसों गुजर सकते हैं

गुजरते पलों की रफ़्तार का
कुछ ऐसा ही है अपना भी तजुर्बा
कुछ बरस बीते पलों में
और बीते कुछ पल बरसों में
कभी मिला कोई जो था वक़्त से आगे
कोई गुजरे हुए पल में गड़ा
पर वक़्त नहीं मिला कहीं रुका हुआ,
वो हरदम चलता ही रहा
मैं तो नहीं पकड़ सका
मैं कोशिश कर सका
बस इसके साथ चलने की,

लौटते नहीं देखा मैंने
वक़्त  को कभी
और कभी मिला जो मुड़कर
एक गुजरा हुआ पल
तो वो पल भी वही नहीं था
उसका चेहरा मिला
कुछ बदला बदला सा

वक़्त क्या सच मे गुजर जाता है
हमेशा हमेशा के लिए
क्या जिस पल मेंअभी हम हैं
वो सचमुच गुजर गया है
वो कौन सा पल है
जिसमें मैं हूँ अभी

कई बार चाहा कि
गुजरे वक़्त में जाकर
बदल दूँ अपना आने वाला कल
चाहा कि आने वाले कल
के घर दस्तक दे
मोड़ दूँ अपना आज का रास्ता,
सुना है मैं भाग सकता हूँ
तेज़ वक़्त से और तुम भी
पर मैं तो दौड़ हारता रहा हूँ
आज तलक इस वक़्त से, 
तुम्हारी तुम जानो
ये बस वैसा ही चला
जैसा इसे मंज़ूर था

बदलते वक़्त की छाप
मिलती है जर्रे-जर्रे में
मैं नाप सकता हूँ
दूरियाँ पलों की
जो फैली पड़ी है
खुशियों और तनहाई के बीच
देखा है मैंने भी वक़्त को
सिर्फ गुजरते हुए

जान सका हूँ मैं तो सिर्फ यही कि
मुझे जो करना है वो इसी आज में
मैं तो सिर्फ इसे पूरा जीकर
बीते और आने वाले पलों को
बना सकता हूँ यादगार

इस कायनात के आगे
मैं कुछ नहीं तुम कुछ नहीं
दुनिया बार-बार बनेगी
पर मैं और तुम
क्या दुबारा होंगे यहाँ
क्या हमारा वक़्त लौटेगा

हमारा वक़्त है
सिर्फ ये आज
हमारा वक़्त है वो
जो है अभी और यहीं
जिस पल मैं मुख़ातिब हूँ तुमसे
बस ये पल हमारा है ....
रजनीश (25.02.2012)
टाइम ट्रेवल और सापेक्षता के सिद्धान्त पर 

Thursday, February 9, 2012

मेरी दुनिया

मैं चलता हूँ जिस रास्ते पर
एक मील एक कदम
और कभी एक कदम
एक मील का होता है

घर की  सीढ़ी से उतरते
सड़क पर आते आते
घर के भीतर पहुंच जाता  हूँ
और सड़क घर के भीतर 
आ जाती है कभी-कभी 

सड़क पर चलते चलते
देखता हूँ एक फ़िल्म हर रोज़
वही पीछे छूटते मकान
बदहवास से भागते वही लोग
वही आवाजें वही कदम 
जब भी इस सड़क से जाता हूँ
इस सड़क पर मैं नहीं होता

अंनजान चेहरों  में
दिखते अपने जाने-पहचाने 
मिलते हैं अपने जाने-पहचाने 
बेगाने भी हर रोज़ 

मेरे भीतर एक और मैं 
उसके भीतर शायद एक और 
परत दर पर कई जिंदगियाँ 
बारी-बारी दिन भर 
सामने आती रहती हैं 

दिन भर कई जगह 
बढ़ते कदमों के साथ 
थोड़ा-थोड़ा छूटता जाता हूँ 
कहीं मैं कहीं मेरे निशान 
हर डूबते सूरज के साथ 
शाम जो लौटता है 
पूरा मैं नहीं होता 
घर की दीवारें भी 
कुछ बदल जाती हैं 

रात को बंद  आंखे 
देखती हैं कुछ सड़कें घर और चेहरे 
जो रात समेट कर ले जाती है 
सुबह-सुबह अपने साथ 

कुछ पल रोज़ 
अपना चेहरा देखता हूँ 
आईने में ..
पहचान नहीं पाता 
देखते देखते 
अपना चेहरा भूल सा गया हूँ 
और  कुछ पलों से ज्यादा 
 ठहर नहीं सकता 
आईने के सामने 
क्यूंकि वक़्त कहाँ होता है इतना 
क्या करूँ ...
..........रजनीश (09.02.12)

Tuesday, December 27, 2011

बदलता हुआ वक़्त


महीने दर महीने 
बदलते कैलेंडर के पन्ने 
पर दिल के कैलेंडर में 
 तारीख़ नहीं बदलती  

भागती रहती है घड़ी 
रोज देता हूँ चाबी 
पर एक ठहरे पल की 
किस्मत नहीं बदलती   

बदल गए घर 
बदल गया शहर 
बदल गए रास्ते 
बदला सफर 

बदली है शख़्सियत
ख़याल रखता हूँ वक़्त का 
बदला सब , पर वक़्त की 
तबीयत नहीं बदलती 

कुछ बदलता नहीं 
बदलते वक्त के साथ 
सूरज फिर आता है 
काली रात के बाद 

उसके दर पर गए 
लाख सजदे किए 
बदला है चोला पर 
फ़ितरत नहीं बदलती

क़यामत से क़यामत तक 
यूं ही चलती है दुनिया 
चेहरे बदलते हैं पर 
नियति नहीं बदलती ...
रजनीश (27.12.2011)
एक और साल ख़त्म होने को है पर क्या बदला , 
सब कुछ तो वही है , बस एक और परत चढ़ गई वक़्त की ....

Saturday, November 26, 2011

छलावा

2011-11-15 17.34.22
तुम्हें जो खारा लगता है
वो सादा पानी होता है
समझते हो कि आँखों से
मेरा ये दिल टपकता है
मेरे आँसू क्या सस्ते हैं
गैरों के दर्द पर रोएँ
दिल नहीं दिखावा है
वही भीतर से रोता है

फंसा तो खुद में ही मैं हूँ
मुझे तो फिक्र अपनी है
परेशां खुद से ही मैं हूँ
तुम्हारी सुध मैं कैसे लूँ
मुझे फुर्सत कहाँ तुम्हारी
तकलीफ़ों पर मैं  रोऊँ
मेरा करम मेरे सीने में
हर दिन दर्द पिरोता है

होता वो नहीं  हरदम
नज़रों से  जो दिखता है
छलावा है जहां, जिसमें
भरम का राज होता है
खेलते हो  जब भी होली
किसी की सांस छीन कर तुम
लाल वो रंग नहीं होता
किसी का खून होता है

खुद को दोष क्या दूँ मैं
शिकायत क्या तेरी  करूँ
मुझे हर कोई मुझ जैसा
खुद में खोया लगता है
था बनने चला जो ईंसां
ज़िंदगी की राहों पर
जानवर रह गया बनकर
हरदम अब ये लगता है
.....रजनीश (26.11.2011)

Friday, July 22, 2011

बदलाव

DSCN1443










है जिंदगी  वही ,ज़िंदगी के मायने बदल गए,
हैं चेहरे वही पुराने पर आईने बदल गए॰

है सूरज वही है चाँद वही , है दिन वही है रात वही,
है  दुनिया वही , पर दुनियादारों के मिजाज बदल गए॰

है साकी वही है शराब वही, है पैमाना औ मयखाना वही 
है हमप्याला वही , नशे के पर अंदाज बदल गए॰

वही पैर वही जिस्म, वही ताकत वही हिम्मत,
है दौड़ का जज़्बा वही, पर दौड़ के मैदान बदल गए॰

है शोहरत वही, है शराफत वही, है इज्ज़त औ मोहब्बत वही,
कायम रही है मंजिलें पर रास्ते बदल गए॰

है सच वही है झूठ वही, है पुण्य वही है पाप वही,
है  धरम औ इंसाफ वही, पर इनके तराजू बदल गए ,
.......रजनीश (13.12.93)

Friday, April 29, 2011

कुछ बातें

DSCN1303
[1]
क्यूँ ढूंढते हो
गॉड पार्टिकल
कृत्रिम वातावरण में,
जबकि गॉड तो
हर पार्टिकल में है ।
[2]
तुम खोज लेते हो
कोई एक नेता
क्यूंकि तुम नहीं चाहते
खुद कुछ  करना
और वक्त भी कहाँ तुम्हारे पास  !
[3]
तुम कहते रहते हो
खत्म हो जाएगी दुनिया
क्यूंकि तुम्हें  चाहिए
कोई बड़ा सा डर
जो तुम्हारे छोटे-छोटे
डर निगल जाये ।
[4]
तुम भ्रष्टाचार
के जिस पेड़ की
टहनियाँ जंतर-मंतर पर
काट रहे थे
उसकी जड़ें तुम्हारे
आँगन तक आई हैं ।
[5]
महापुरुष का
उत्तराधिकारी नहीं होता
क्यूंकि
महापुरुष नाम का
कोई पद नहीं होता ।
...रजनीश (29.04.11)

Tuesday, March 15, 2011

कंपन

DSCN3703
धरती काँपती है ,
हर तरफ होता विनाश साक्षी है ।
दिन में ,
कुछ पलों के लिए
मैं  भी जमीन पर होता हूँ,
पर कभी महसूस नहीं हुआ,
जमीन का तनाव, वो कंपन ।
कल कान लगाकर
सुनने  की कोशिश की
धरती की धड़कन,
बस अपनी ही ध्वनि सुन सका ।
पर, शांति के इस समुद्र का  तल
अशांत पत्थरों का घर क्यूँ  है ?
धरती  अधूरी है अभी ,
अजन्मी, अर्धविकसित,  
तभी तो भीतर ये हलचल है ।
कुछ अभी तक अधूरा ।
क्यों ,मेरे अंदर भी
ढेर सारा और दबा हुआ
लावा है ?  क्यूंकि मैं भी
इसी धरती का पुत्र हूँ ?
इसका अंश , पूरा-पूरा धरती जैसा ,
मैं भी तो अभी गर्भ में हूँ ।
उसी अधूरेपन, उसी अपूर्णता
का रोपण इसकी छाती
पर भी करता हूँ ।
अपनी दुनिया बसाता हूँ,
एक अस्थिर नींव पर
अधूरा, अशक्त मकान  बनाता हूँ
और करता रहता हूँ असफल कोशिश
अपनी नश्वरता को पोषित
करने की इस घर में ।
बस एक आशा है ..
जब धरती  बन जाएगी पूरी,
तब  नदी  कभी गांव में नहीं आएगी,
सागर तांडव नहीं करेगा ,
झील गुम नहीं होगी,
पहाड़ चलना बंद कर देंगे,
हरी-हरी  चादर को नहीं जलाएगा लावा,
कोई घर भी नहीं टूटेगा,
और फिर मेरा जन्म होगा ,
एक शांत, संतुष्ट और सम्पूर्ण मैं ...
..रजनीश (15.03.2011)

Sunday, February 20, 2011

दुनिया

DSC00418
जहां रहता हूँ  मैं, है वो  इक दुनिया,
जहां घर तुम्हारा  , वो भी इक दुनिया...

देखा था जिसे ख्वाब में ,  वो इक दुनिया,
हक़ीक़त में जो मिली ,  वो भी इक दुनिया...

था छोड़ा कल जिसे,  वो इक दुनिया,
कल मिलूँगा जहां तुमसे,  वो भी इक दुनिया...

बाहर  मिली जो मुझसे,  वो इक दुनिया,
ज़िंदा जो मेरे भीतर , वो भी इक दुनिया...

है तेरी और  मेरी, साझा वो इक दुनिया,
है ना तेरी  और ना मेरी ,  भी इक दुनिया !

तेरी दुनिया के अंदर मेरी, वो  इक दुनिया,
मेरी दुनिया के अंदर  तेरी, भी इक दुनिया...

जो मेरे कदमों तले कुचली, वो थी इक दुनिया,
जिसे  हाथों में है सम्हाला , ये भी इक दुनिया ...
.....रजनीश (20.02.2011)

Saturday, January 15, 2011

सूर्य वंदना

IMAG0789
हे सूर्य ! तुम्हारी किरणों से,
दूर हो तम अब, करूँ पुकार ।
बहुत हो गया कलुषित जीवन,
अब करो धवल  ऊर्जा संचार ।

सुबह, दुपहरी हो या साँझ,
फैला है हरदम अंधकार । 
रात्रि ही छाई रहती है,
नींद में जीता है संसार । 

तामसिक ही दिखते हैं सब,
दिशाहीन  प्रवास सभी ।
आंखे बंद किए फिरते हैं...
निशाचरी व्यापार सभी ।

रक्त औ रंग में फर्क न दिखे,
भाई को भाई   न देख सके ।
अपने  घर में ही  डाका डाले,
सहज कोई पथ पर चल न सके ।

हे सूर्य ! तुम्हारी किरणों से,
दूर हो तम अब, करूँ पुकार ।
भेजो मानवता किरणों में, 
पशुता से व्याकुल संसार ।
....रजनीश (15.01.11) मकर संक्रांति पर

Saturday, January 8, 2011

मुश्किलें

IMAGE_585
पढ़ा नहीं जाता,  आंसुओं से लिखा पन्ना..   
चखो कागज को , नमक का अंबार मिलेगा ....

महसूस नहीं होता, छूने से  दिल का खालीपन..
भीतर उतरो ,  वहाँ  सूना दरबार मिलेगा....

सुन नहीं सकते , कहकहों मेँ, दिल की धड़कन..
आँखों मेँ झांको , रोता हुआ प्यार मिलेगा ....

उजाड़ कहते हो, जिन टूटते खंडहरों को..
उधर से गुजरो , एक जिंदा संसार मिलेगा....

दूर बैठे हो क्यूँ ,मुंह फिराये हुए..
गले लगा लो,  बिछुड़ा हुआ यार मिलेगा ....

नहीं मिलता वो, पत्थरों की बस्तियों में..
पूजो इंसान को,  परवरदिगार मिलेगा ....
.......... रजनीश (08.01.11)

Monday, December 27, 2010

पोर्ट्रेट-1

IMAG0302
आइनों सी टाइल्स  पर पड़ती
बड़े फानूसों की  रोशनी में,
उसका प्रतिबिंब नज़र आया मुझे ,
लकड़ी से बनी एक डिज़ाइनर कुर्सी
पर उसे बैठे देखा था ...
एक भोली सी - कुछ अधेड़ सी लड़की...
स्वर्ग सदृश , सुवासित माहौल में,
सुमधुर संगीत
खूबसूरत दीवालों से टकराकर ,
सतरंगी रोशनियों के साथ
फैला था हर तरफ,  प्रस्तुत करता एक नृत्य ...
वैभवशाली चहल-पहल में ....एक  आनंदोत्सव चल रहा था ...
उस मॉल में ....

मैं मौजूद था वहाँ इसका एक-एक पल जीने...
और मेरी नजर पड़ी थी उस पर, 
पर नजरें उसकी , पता नहीं कहाँ
अटकी हुई थीं,
उसके सामने धरी कॉफी टेबल तो खाली थी ,
फिर पता नहीं उसकी आंखे क्या पी रही थीं ,
वो तो हिल भी नहीं रही थी कुर्सी से ,
पर मुझे लगा की वो चल रही थी,
इधर-उधर गलियारे में ,
थिरकती हुई नृत्य भी कर रही थी...
हाथ तो खाली थे उसके और
उनमें से एक तो ठोड़ी पर ही था,
पर मुझे लग रहा था जैसे वो
तैरती  रोशनी को थामने की कोशिश कर रही थी,  
फिर एक शून्य भी दिखा था चेहरे पर लटका ,

तब  मैं अपने घुटनों पर हाथ टिकाकर
कुछ करीब से देखने लगा था उसे ,
वो खूबसूरत लग रही थी –एक
इंसान की तरह...
शायद किसी ने सराहा नहीं उसे कभी....
आँखों में भंवर थे कुछ उसके
और चेहरे पर चस्पा थी एक हंसी -काफी बारीक सी ,
मोनालिसा की याद आ गई...

फिर थोड़ा और करीब आ गया मैं उसके
और करीब से देखने ...
न तो वो संगीत की धुन पर नाच रही थी,
न ही वो कांच की अलमारियों में
रोशनी से नहाते जेवरों को देख रही थी ,
न ही लगती थी वो जुड़ी कहीं से,
ऐसा लगा
शायद वो तो थी ही नहीं 
वहाँ

क्या जरूरत है मुझे उसके
बारे में सोचने या जानने की,
मैं इसी उधेड़बुन में थोड़ा
परेशान सा होने लगा था,
इस जगमग के किसी हिस्से में
तो होगा उसका सपना
या फिर उसकी खुशी,

यही सोच रहा था,
तभी एक खूबसरत राजकुमार से
प्यारे बच्चे के साथ आई
सुंदर कपड़ों में लिपटी एक नारी
लिए ढेर सारा समान ,
यही तो वो सबकुछ था ,
जिसकी देखरेख का जिम्मा था इस लड़की पर
सम्हालने लगी जिन्हें वह लड़की,
मालकिन ने फिर एक कॉफी भी
रखवा दी उसकी टेबल पर ...

फिर कुछ समय बाद , सब कुछ उठा ,
वह 
चल पड़ी ....
उसकी  चाल बता रही थी
कि  वो अपनी दुनिया में
वापस लौट रही थी....
उसके जाने के बाद
उस खाली पड़ी कुर्सी पर
मैं उसे बहुत देर तक देखता रहा....
IMAG0082
.........रजनीश (26.12.10)

Sunday, December 5, 2010

बदलाव

DSCN1379
है जिंदगी  वही ,पर  मायने बदल गए,
हैं चेहरे वही पुराने पर आईने बदल गए॰

है सूरज वही है चाँद वही , है दिन वही है रात वही,
है  दुनिया वही , पर दुनियादारों के ठिकाने  बदल गए॰




DSCN1439

है साकी वही है शराब वही, है पैमाना औ मयखाना वही 
है हमप्याला वही , नशे के पर अंदाज बदल गए॰

वही पैर वही जिस्म, वही ताकत वही हिम्मत,
है दौड़ का जज़्बा वही, पर दौड़ के मैदान बदल गए॰




DSCN1443
है शोहरत वही, है शराफत वही, है इज्ज़त औ मोहब्बत वही,
कायम रही है मंजिलें पर रास्ते बदल गए॰

है सच वही है झूठ वही, है पुण्य वही है पाप वही,
है  धरम औ इंसाफ वही, पर इनके तराजू बदल गए ,

.......रजनीश (13.12.93)

Thursday, November 25, 2010

व्यथा

IMAG0638

















मैंने देखी हैं ,एक जोड़ा आँखें ,
  उम्र में छोटी, नादां, चुलबुली,
कौतूहल से भरी ,
पुराने चीथड़ों की गुड़िया
 खरोंच लगे कंचों
 पत्थर के कुछ टुकड़ों
 और मिट्टी के खिलौनों में बसी
 कुछ तलाशती आँखें
 भोली सी, प्यारी सी ,  
 दूर खड़ी , मुंह फाड़े , अवाक सब देखतीं हैं
 ... कितनी  हसीन दुनिया                                            
इन आँखों मे बनते कुछ  आँसू चाहत  के      
निकलते नहीं बाहर
और  आँखें ही अपना लेती हैं  उन्हें ..               
और मुड़कर घुस जाती हैं
 फिर उन चीथड़ों पत्थरों और काँच के टुकड़ों में                   
........रजनीश
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....