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Saturday, August 31, 2013

तू जब भी मुझसे मिले ...


तू जब भी मुझसे मिले ऐसे मिले
ज्यों रात चाँद चाँदनी से मिले
तू जब भी मुझसे...

हुई जब भी आहट तेरे आने की
पन्नों के बीच दबे फूल खिले
तू जब भी मुझसे...

तेरी आवाज़ जब भी सुनता हूँ
लगे है बंसरी को जैसे सुर हो मिलें
तू जब भी मुझसे...

जो फ़ासला था वो फ़ासला ही रहा
दो पटरियों की तरह संग चले
तू जब भी मुझसे...

तेरे खयाल जब भी दिल से बात करें
तेज़ बारिश हो आंधियाँ भी चलें

तू जब भी मुझसे मिले ऐसे मिले
ज्यों रात चाँद चाँदनी से मिले
........रजनीश ( 31.08.2013)

Sunday, December 11, 2011

चंद्र ग्रहण

कुछ यूं 
हुआ था चाँद के साथ
कि चलते चलते
 कुछ पल चाँद खो गया था,
पूनम की रात 
चाँद के बिना 
सेज पर इंतज़ार करती रही 
दुल्हन की तरह 
कुछ पलों को जलती रही 
था मजबूर चाँद 
ये वफ़ा थी रस्तों से 
एक करार  था 
सफर के साथियों से  
उसे निभाना था
जो डगर थी उसपर 
ही जाना था ,

रास्ते  ही कुछ
 ऐसे होते  हैं 
कि कभी कभी 
अपना वजूद 
ही गुम जाता है 
खो जाती है मुस्कुराहट 
साथ निभाते-निभाते 
उखड़ जाते हैं पैर 
और दिल भी टूट जाता है, 

वक्त की आंधी के बाद 
पर  चाँद फिर से 
 निकल अंधेरे से 
चाँदनी का घूँघट 
हौले से हटाता है 
और  मीठा सा 
अहसास होता है 
कि दर्द भरा पल 
जो ठहरा सा लगता है 
सदा साथ नहीं रहता 
गुजर ही जाता है 
....रजनीश (11.12.11)

Wednesday, October 12, 2011

एक आवाज़

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एक आवाज
बन जाती है बांसुरी तन्हाई की
एक आवाज़
थिरकती है दिल की धड़कन के साथ
एक आवाज़
चलती है मिला हाथ से हाथ
एक आवाज
घुल जाती है सांसों में
एक आवाज़
मख़मल में लिपटी गुनगुनाती है
एक आवाज़
एक लम्हे को खींच लाती है
एक आवाज़
सूखे पत्तों पे गिरती है बनके बर्फ
एक आवाज
गूँजती है वादियों में
टकरा के दिल की दीवारों से
एक आवाज़
मिलती है चादर की सिलवटों पर
एक आवाज़
नाचती है चाँदनी के आँगन में
एक आवाज़
दिल में उतर जाती है
एक  आवाज़
जिसकी धड़कने कभी नहीं थमती ..
बिरली होती हैं ऐसी आवाजें .....
....रजनीश (12.10.2011)
( जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....