लम्हा दर लम्हा
मैं कुछ जीतता गया
कुछ भीतर रीतता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं कुछ जोड़ता गया
कुछ पीछे छोड़ता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं कुछ जुटाता गया
कुछ यूं ही लुटाता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं कुछ निभाता गया
कुछ रिश्ते भुलाता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं कुछ अपनाता गया
कुछ मौके ठुकराता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं सब को हंसाता गया
कभी खुद को रुलाता गया
वक्त बीतता गया
लम्हा दर लम्हा
मैं जीवन की बगिया
सींचता गया
वक्त बीतता गया
..... रजनीश (१५.१०.२०२०, गुरुवार)
