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Wednesday, April 15, 2015

एक वक़्त ऐसा भी

एक वक्त
ऐसा भी होता है
जब दिन गुजरता जाता है
घड़ी की सुई की तरह
बिना ठहरे कहीं भी कुछ घड़ी

बस कोल्हू की मानिंद
ज़िंदगी की सुई एक दायरे में
घूमती चली जाती है
जैसे पंखों को फैलाये
बिना फड़फड़ाए
तैरता हो एक बाज हवा मेँ

कुछ ठहरता नहीं
पर ज़िंदगी ठहर जाती हो जैसे
एक ऐसा ठहराव
जिसमें सुकून नहीं
जिसमें आराम नहीं
जिसमें पड़ाव नहीं
जिसमें कुछ रुकता नहीं
और फिर ये वक़्त
एक आदत बन जाता है

.......रजनीश  (15.04.15)

Sunday, January 25, 2015

चलो कुछ लिखा जाए


जुबां पर लफ्ज जब रुक जाएँ
तो आए लिखने का मौसम
दिल को एक खयाल जब सताए
तो आए लिखने का मौसम
जब कोई ज़ख्म कुरेद जाए
तो आए लिखने का मौसम
वो जाम आँखों से जब पिलाए
तो आए लिखने का मौसम
जब एक लम्हा ठहर जाए
तो आए लिखने का मौसम
जब वक्त से बिछड़ जाएँ
तो आए लिखने का मौसम
जब मनचाहा मिल ना पाए
तो आए लिखने का मौसम
जब एक हसरत पूरी हो जाए
तो आए लिखने का मौसम
दिल में जब तनहाई उतर आए
तो आए लिखने का मौसम
दिल से जब दिल मिल जाए
तो आए लिखने का मौसम

...........रजनीश (25.01.15)

Sunday, December 28, 2014

कोहरा

कोहरे की परत में
कुछ यूं ढँक जाती है ज़िंदगी
कि हाथ को हाथ नहीं सूझता
क्या मंज़िल , रास्ता ही नहीं दिखता
सर्द हवाएँ फैलाती हैं कोहरा हर तरफ
रोशनी हो जाती है गुम
पता सूरज का भी नहीं चलता
अंधे हुए जाते कदम
जाने किस ओर लिए जाते हैं
हैं कोहरे में चलते साथ लोग
पर राह में कोई साथ नहीं दिखता
ये आता भी तभी है जब जागने का वक्त हो
नए सूरज की रोशनी में कहीं चलने का वक्त हो
कभी कोहरा संग तूफान लिए आता है
किसी पत्थर से टकरा ज़िंदगी ले जाता है 
सब कुछ थमा देने वाला कोहरा भी छंट जाता है
छूटा जो हाथ था वो हाथ मिल जाता है
जैसा वो आता है वैसा ही चला जाता है
जो गुम हो गया था वो रास्ता मिल जाता है
कोहरा जो बाहर है वो तो सीख है वक्त की
ये कोहरा था बाहर का पर एक कोहरा है भीतर भी
भीतर के कोहरे का कोई वक्त न कोई मौसम
भीतर के कोहरे की न कोई सीमा न कोई उम्र   
एक का एहसास होता है उसके आने पर
दूजे का एहसास होता है उसके जाने पर
एक का इलाज़ बस इंतज़ार , नहीं लड़ना
दूजे का इलाज़ बस इंतज़ार नहीं; लड़ना
यानि ...
बाहर के कोहरे से डरो , ना लड़ो
भीतर के कोहरे से डरो ना, लड़ो ...
.........रजनीश (28.12.14)

Sunday, April 8, 2012

कुछ पलों के लिए

अनायास ही कुछ बूंदें आसमान से आकर
जमीन पर गिर पड़ीं
नीम दर्द से तपती जमीं पर
थोड़ी ठंडक छोड़ती
भाप बनती बूंदें
कुछ पलों के लिए

धूल का गुबार
थम सा गया था
और भाप होती बूंदों
के बचे हिस्सों ने उढ़ा दी थी
एक चादर जमीं पर
कुछ पलों के लिए

ठंडी हवा के झोंके में
जमीं का दर्द घुलकर
गुम गया था
मैं चल रहा था
हौले -हौले सम्हल सम्हल
ताकि जमीं रह सके इस सुकून में
कुछ पलों के लिए

फिर भी  उभर आए
मेरे पैरों के निशान
और धीरे धीरे
फिर धूल आने  लगी ऊपर
दब गई थी धूल
बस कुछ पलों के लिए

जैसे कोई बूढ़ा दर्द
थम गया हो
बरसों से जागती
आँखों में आकर बस गई हो नींद
एक उजाड़ से सूखे बगीचे में
खिल गया हो एक फूल
कुछ पलों के लिए

कुछ पलों का सुकून
कुछ पलों की बूँदाबाँदी
जलन खत्म नहीं करती
पर एहसास दिला जाती है
वक्त एक सा नहीं रहता
वक्त बदलता है
बुझ जाती है प्यास
बरसते हैं बादल  
साल दर साल
पर वक़्त नहीं आता
अपने वक़्त से पहले
................रजनीश (08.04.2012)
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