Saturday, January 22, 2011

व्याकरण और शब्दकोश

shabd
चेहरे पे लिखी इबारत,
पढ़ना हो तो,
सिखाए गए व्याकरण से रिश्ता
तोड़ना पड़ता है,
भाषा की स्कूली किताब ,
वापस रखनी होती है शेल्फ मेँ ...
क्योंकि यहाँ शब्द एक लाइन में नहीं होते ,
पहले अल्प विराम और
फिर उसके बाद हो सकता है-
कई जाने-अनजाने चिन्हों के साथ 
कोई टूटे -फूटे शब्दों का कारवां,

चेहरे पर लटकती लिखावट में
भूतकाल  आ सकता है वर्तमान मेँ ,
प्रश्न हो जाता है उत्तर
और उत्तर मेँ मिलते हैं प्रश्न ,
चेहरे पर उभरे- इस मौजूद पल मेँ-
मुस्कुराते हुए शब्दों मेँ,
भविष्यकाल की किसी आशा
से   मुलाकात हो सकती है,
जो मैं है ,वो तू हो सकता है ,
और तू है , वो हो सकता है मैं...

चेहरे पर लिखी इबारत समझने मेँ,
खरीदे गए और अपने बनाए शब्दकोश  भी काम नहीं आते  ,
क्योंकि , खुशी के घर मेँ आपको
दुख का बसेरा मिल सकता है चेहरे पर,
ढाई आखर का अभिमान हो सकता है,
और घृणा मेँ लालसा.....
मेरा-तेरा , अच्छा-बुरा हो सकते हैं समानार्थी...
कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं ...
क्योंकि यहाँ कोई आत्मा नहीं रहती शब्दों में ,
और वो बदल-बदल मुखौटे  फिरते हैं चेहरों पर,

फिर जो चेहरे पर लिखा होता है ,
वो कभी-कभी छूने पर गुम हो जाता है,
कोई शब्द कभी  छुप जाता है,
और आँखेँ गड़ाकर देखो तो
कभी कोई अपना रूप ही बदल लेता है ,
ज्यादा करीब आओ
तो सारे के सारे  गुम हो सकते हैं
क्योंकि चेहरे पर उनके घर नहीं होते ,
वो भीतर चले जाते हैं ...
बड़ा विचित्र है उनका ठिकाना ,
जहां बैठा कोई पहनाता रहता है इन्हें मुखौटे ,
वो रहते हैं उस तिलस्म मेँ ,
जहां पर धड़कता है दिल,
वहाँ से बस कुछ बित्ते की दूरी पर ,
उनके कुछ कमरे ऊपर भी हैं 'भेजे' में  ,
कहाँ रहें , कहाँ से चलें ...
इसी ऊहापोह में शब्द भी थक जाते हैं कई बार,

ये शब्द नौकरी करते मिलते हैं
एक "अव्यक्त" की ,
जिसे  छुपाने या उभारने मेँ लगे होते हैं ये शब्द ,
जो चलते-चलते जुबां तक पहुँच पाते हैं
उन्हें सुन भी सकते हैं आप ,
बाकी इधर-उधर,
मसलन आंख वगैरह पर खड़े मिलते हैं  

बोलते चेहरे की बात
समझने /और झाँकते, फिरते शब्दों को पहचानने  -
उनके घर- उस तिलस्म तक जाना
होता है , और यारी करनी पड़ती है उनसे ,
खुद को बाहर फेंक कर वहीं रहना पड़ता है ,
वही चेहरा बन जाना होता है,
और तब शब्द , 
व्याकरण की असली किताब और असली डिक्शनरी
खुद ही लाकर रख देते हैं
आपके हाथों मेँ ....
....रजनीश (22.01.2011)

2 comments:

Akshitaa (Pakhi) said...

बहुत सुन्दर कविता...बधाई.

_________________________
'पाखी की दुनिया' में 'अंडमान में एक साल...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

aur tab shabd ............
....................aapke hathon me .
sundar bhavo ki sookshm abhvyakti ..

पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....