एक रोशनी
बुझते बुझते
एक आग दे गई
दरिंदगी से लड़ती
एक आवाज़ दे गई
खो गई
कहीं आसमां में
इक राह दे गई
हैवानियत ख़त्म करने की
एक चाह दे गई
जूझती रही
बिना थके
दुनिया हिला गई
अत्याचार से लड़ने
कई दिल मिला गई
ना खत्म हो ये जज़्बा
ये सैलाब रुक ना जाए
इक शहादत से जली
ये मशाल बुझ न पाए...
....रजनीश
(05.01.2013)
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
चढ़ गई एक और परत
वक़्त की हर तरफ़
कुछ सूख गए पेड़ों और
कुछ नई लटकती बेलों में
बस कुछ खट्टी मीठी यादें
बाकी सब , पहले जैसा ही हाल
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
एक बारिश सुकून की
धो गई कुछ ज़ख़्म इस बरस
कुछ अरमान ठिठुरते रहे
कड़कड़ाती ठंड में सहमे
चढ़ते उतरते रहे मौसम के रंग
जवाबों में फिर मिले कुछ सवाल
बस जाने वाला है इक साल
बस आने वाला है इक साल
....रजनीश (16.12.2012)
गुजरता जाता है वक़्त
वक़्त को पकड़ते-पकड़ते,
भूलता जाता हूँ अपनी पहचान
वक़्त को पहचानते-पहचानते,
खोता जाता है वक़्त
खोये वक़्त को समेटते-समेटते,
खुद से लड़ जाता हूँ
अपने वक़्त से लड़ते-लड़ते,
खुद उखड़ता जाता हूँ
भागते वक़्त को रोकते-रोकते...
जी लिया वक़्त को जिस वक़्त
बस वही वक़्त अपना होता है
वरना गुम जाती है आवाज़
बस वक़्त को पुकारते-पुकारते ...
. .....रजनीश (29.11.2012)
साल दर साल
हम करते हैं दहन
एक पुतले का
नाम दिया है जिसे रावण
लीला का मंच सजा
बना देते किसी को राम
जो अंत में करता है
रावण का काम तमाम
हर साल बढ़ती जाती
पुतले की ऊंचाई
जलाते हर साल
पर मिटती नहीं बुराई
पैदा हो जाता है
हर चिंगारी से एक रावण
क्यूँ है नाभि में अमृत अब भी
ढूंढो इसका कारण
दरअसल राम हैं अंदर
और है साथ में रावण
पर विभीषण नहीं बताता
अमरत्व का कारण
जब झांकोगे भीतर
और ढूंढोगे कारण
तब बंद होगी पुनरावृत्ति
और मर जाएगा रावण ...
रजनीश (24.10.2012)
विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ ...
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....