बैठा था एक पहाड़ी पर
सामने सोई हुई दिखी
नि:शब्द शांत झील
देखकर कोशिश कर रहा था मैं
टटोलने की -अपने भीतर की खामोशी
एक कंकण अनायास
उछाल दिया झील की तरफ
झील के चहरे पर फैली
शिकन देखी मैंने
पर कंकण कहाँ चला गया
झील से टकराकर तल में
आँखें देख ना पाईं
कंकण स्वीकार करना पड़ा झील को
और विक्षोभ की तरंगें भी ख़त्म
कुछ साँसे लेकर
फिर एक मछली उछली
झील की गहराइयों से
चंद साँसों के लिए
और हिल गई झील की सतह
कुछ पलों के लिए
मछली फिर भीतर
और झील कुछ पलों में
चली गई गहन समाधि में
करीब गया मैं झील के
देख सकता था अपना चेहरा
झील के चेहरे मेँ
आँखों मेँ आँखें डाल
जो थोड़ा अंदर झाँका तो
भीतर झील के शांत नहीं था सब
पर उसके अंदर जो भी हलचल थी
वो उसकी नहीं उन मछलियों की थी
जो रह रह कर ऊपर आ जाती थीं
झील का सीना चीरकर या
उन कंकड़ों की जो बाहर आए थे
कल छुआ था झील के पानी को
कुछ गरम था सूरज की रोशनी में
और धीमे धीमे
भाप हो रहा था झील का वजूद
उसी झील का
आज कुछ हिस्सा जमा हुआ है
उसका चेहरा
बर्फ की परत ने ढँक लिया है
मैं देखता रहा
झील कोशिश करती रही
कि पड़ी रहे शांत मौन अचल
पर मैंने पाया
कभी मछली कभी कंकड़
कभी कोई चिड़िया
कभी धूप कभी बूंदे कभी बर्फ़
झील को चैन लेने नहीं देते
ना ही सोने देते उसे
उसे वो होने देने से रोकते हैं सब
जो होना चाहती है
शांत अचल नि:शब्द मौन
झील लगी बिलकुल
अपने मन के जैसी
हाथ मेँ रखे एक और कंकड़ को
वापस रख दिया मैंने जमीन पर
और वापस लौट पड़ा
अपने हिस्से के
मीठेपन खारेपन
कंकड़ पत्थर
धूप बारिश बर्फ़ की तरफ़
.............रजनीश (02.03.14)