Sunday, June 22, 2014

रेलगाड़ी ...छुक छुक छुक छुक



रेलगाड़ी रेलगाड़ी
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
बढ़ा किराया दिल मेरा बोले 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 



हम भी कभी रेल से थे जाते 
यहाँ वहाँ यात्रा कर आते 
पैसे देकर टिकट थे लाते 
जो बच जाते  वो घर ले जाते 
अब तो जो हम लेकर जाते 
वो पैसे भी हैं कम पड़ जाते 

रेल बुलाती आज भी हमको 
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
पर जेब बेचारी है ये कहती 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 

कभी रेल का सफ़र था मजा
अब तो रेल का सफ़र है सजा  
क्यूंकि सस्ते में था हो जाता
रोटी के लिए भी कुछ बच जाता
कमरतोड़ महंगाई से निकला दम
कोई सस्ता रस्ता नज़र नहीं आता

 रेल बुलाती आज भी हमको 
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
पर जेब बेचारी है ये कहती 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 

....रजनीश (22.06.2014)

Friday, May 30, 2014

अच्छे दिन


अच्छे दिन ....

कौन से दिन होते हैं अच्छे
जिस दिन होता हूँ मैं अच्छा
या जिस दिन होते हो तुम अच्छे
या जिस दिन मैं तुम्हारे लिए अच्छा
या जिस दिन तुम मेरे लिए अच्छे

कौन से दिन होते हैं अच्छे
जिस दिन हम दोनों ही हों अच्छे
या सारा जग ही हो अच्छा
या जिस दिन हम जग के लिए अच्छे
या जिस दिन जग हमारे लिए अच्छा

कौन से दिन होते हैं अच्छे
जिस दिन की जब बीती रात अच्छी
या जिस दिन की सुबह अच्छी
या जिस दिन की दोपहर शाम अच्छी
या जो दिन पूरा का पूरा अच्छा

कौन से दिन होते हैं अच्छे
जिनसे पहले बीते हों बुरे दिन
या जिनके आगे हों बुरे दिन
या जो कभी बीते ही नहीं वो दिन
या जो कभी आते ही नहीं ऐसे दिन

कौन से दिन होते हैं अच्छे
मुट्ठी भर अच्छे पलों वाले दिन
या ढेर सारे अच्छे पलों वाले दिन
या  जो बीत गए वो पुराने हुए  दिन
या जो आएंगे वो उम्मीदों वाले दिन

अच्छा दिन गर खोजें तो सपना है
अच्छा दिन गर जी लें तो अपना है
जो सच होता है वर्तमान में
अच्छा दिन ना बीतता है
अच्छा दिन ना आता है
जो जीता है वो पाता है
अच्छा दिन बस होता है
अभी यहीं हर कहीं
आज है अच्छा दिन ......

रजनीश ( 30.05.2014)

Tuesday, April 15, 2014

चुनाव का त्यौहार


पाँच साल में एक बार आता ये त्यौहार 
चुने हुए चंद लोगो की बनती नई सरकार  

हर नेता बरगलाए जनता पर डाले डोरे
होता आया हर बार वादे निकलते कोरे

किसको दे दें वोट किसका समर्थन छोड़े
जनता  हुई परेशान दीवारों से सर फोड़े

मजबूती-कमजोरी में पिस गई जनता सारी
महंगाई मुंह फाड़े जनता भ्रष्टाचार की मारी

जनता है कनफ्यूज़ रस्ता कोई ढूंढ न पाये
नेता चीखें “बरबादी” हल कोई बता न पाये

सत्ता का है खेल, मकसद है कुर्सी पाना
नहीं बदलना और वोटर को उल्लू बनाना

मत देकर भेजो सही, गलत को मत ना देना
‘मत’ देना ज़िम्मेदारी,  मौका मत जाने देना 
.........रजनीश (15.04.14)

Monday, March 24, 2014

नया पुराना



होती है नई शुरुआत
हर दिन सुबह के आँगन में
और हर दिन
ढलती शाम के साथ
पहुँच जाता हूँ
उसी पुरानी रात के दरवाजे पर
जो लोरियां सुनाकर
सुला देती है हर बार
कि फिर देख सकूँ
एक नई शुरुआत का सपना

होती है शुरुआत
हर दिन एक नए सफर की
जो गलियों चौराहों से होता
पहुँच जाता है
थका हारा हर शाम
उसी चौखट पर
जो देती है आसरा
कि जुड़ सकें चंद साँसे
और ले लूँ मैं कुछ दम
फिर नए सफर के लिए

होती है शुरुआत
नए चेहरों से नए रिश्तों की हर दिन
जो पेशानीयों पर पड़े बल और
दिलो दिमाग पर छाए जालों में उलझ
कुछ पलों में बासी और उबाऊ हो जाते हैं
और छोड़ जाते हैं जगह
कि देख सकूँ कोई नया चेहरा
बनाऊँ कोई नया रिश्ता

पुराने रस्तों के निशानों /
बीती रातों की यादों /
पुराने चेहरों की तस्वीरों /
सपनों की किताब के पन्नों / को
 बार-बार जीकर यही जाना है अब
कि जहाँ खोजा मैंने
बाहर वहाँ दरअसल
नया कुछ नहीं
सब वही पुराना था

यही जान सका हूँ
इस नए-पुराने की जद्दोजहद में
कि नयापन बाहर कहीं नहीं
वो भीतर है
मेरे देखने में
मेरे दिल की आखों में
मेरे नज़रिये में
कुछ इस तरह देखूँ तो हर पल नया है
पल वो जो आने वाला है
और वो भी जो बीत गया अभी-अभी
.....रजनीश ( 24.03.2014)

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