Sunday, December 28, 2014

कोहरा

कोहरे की परत में
कुछ यूं ढँक जाती है ज़िंदगी
कि हाथ को हाथ नहीं सूझता
क्या मंज़िल , रास्ता ही नहीं दिखता
सर्द हवाएँ फैलाती हैं कोहरा हर तरफ
रोशनी हो जाती है गुम
पता सूरज का भी नहीं चलता
अंधे हुए जाते कदम
जाने किस ओर लिए जाते हैं
हैं कोहरे में चलते साथ लोग
पर राह में कोई साथ नहीं दिखता
ये आता भी तभी है जब जागने का वक्त हो
नए सूरज की रोशनी में कहीं चलने का वक्त हो
कभी कोहरा संग तूफान लिए आता है
किसी पत्थर से टकरा ज़िंदगी ले जाता है 
सब कुछ थमा देने वाला कोहरा भी छंट जाता है
छूटा जो हाथ था वो हाथ मिल जाता है
जैसा वो आता है वैसा ही चला जाता है
जो गुम हो गया था वो रास्ता मिल जाता है
कोहरा जो बाहर है वो तो सीख है वक्त की
ये कोहरा था बाहर का पर एक कोहरा है भीतर भी
भीतर के कोहरे का कोई वक्त न कोई मौसम
भीतर के कोहरे की न कोई सीमा न कोई उम्र   
एक का एहसास होता है उसके आने पर
दूजे का एहसास होता है उसके जाने पर
एक का इलाज़ बस इंतज़ार , नहीं लड़ना
दूजे का इलाज़ बस इंतज़ार नहीं; लड़ना
यानि ...
बाहर के कोहरे से डरो , ना लड़ो
भीतर के कोहरे से डरो ना, लड़ो ...
.........रजनीश (28.12.14)

Wednesday, October 15, 2014

बारिश के बाद


(1)
बारिश के इंतज़ार में
रुक गई थी कलम
किताब पर पड़ी रही
आसमां तकते तकते
स्याही भी सूख चली थी
पन्ने झुलस रहे थे
तब बादल उमड़ पड़े
और फिर बारिश आ गई

कुछ छींटे पन्नों पर  पड़े
और भीग गए कुछ शब्द
धुल गई कुछ लाइनें
एक पन्ना फिर कोरा हो गया
कुछ लाइनों को मिटाने की कोशिश की थी
पर बूंदें उन्हें अनछुआ छोड़ गईं

भीगी किताब को सुखाया
बारिश के जाने के बाद
बदली शक्ल वाली किताब लिए
यही सोचता रहा
क्यूँ हुई ये बारिश ....
....
(2)

बारिश का इंतज़ार
रहता है बारिश होने तक
बारिश हो जाने पर
उसके जाने का इंतज़ार
जैसे मेरे लिए ही होती हो ये बारिश
न मेरे बुलाने से आती है
न मेरे मनाने से जाती है
बारिश का एक मकसद है
जिससे लेती है उसे लौटाती है
जिसका होता है पानी
उसे ही सौंपती है वापस
जमीन की होती है ये बारिश
क्यूंकि पानी भी है इसी जमीन का
पर  हक़ मैं जताता हूँ अपना
इसी लिए दर्द आता है मेरे हिस्से ...

.........रजनीश (15.10.2014)
बड़े दिनों बाद लिखा है । 
पिछली कविता "बारिश के इंतज़ार" 
पर खत्म की थी इसीलिए वहीं से शुरू कर रहा हूँ ...

Thursday, June 26, 2014

बारिश का इंतज़ार

















बारिश ...
बारिश का इंतज़ार
जैसे बरसों से था

वक़्त की गरम धूप
पसीना भी सुखा ले गई थी
दिल पे बनी
मोटी दरारों में
कदम धँसने लगे थे

लगता है
भागते भागते
सूरज के करीब
पहुँच गया था मैं

जो इकट्ठा किया था
अपने हाथों से
अपनी किस्मत का पानी
वो भाप बना
उम्मीद के बादलों में
समा गया था

और जब गिरा पानी
बादलों से पहली बार
तो यूं लगा कि
भर जाएगा मेरा कटोरा
पूरा का पूरा

पर बादलों में
कहाँ था वो कालापन
कहाँ थी वो बरस जाने वाली बात
कुछ मतलबी हवाओं संग
कहीं और निकल गए बादल

जो थोड़ी बूँदा-बाँदी
ये वक़्त करा देता है
तरस खाकर,
उसी में भिगोये खुद को
इंतज़ार किया करते है

हरदम यही लगता है
कि होने को है
अपने हिस्से की बारिश

बारिश का इंतज़ार
बरसों से है ....
...............रजनीश (26.06.2014)
( जून में तो बारिश हुई नहीं ठीक से ,
मौसम विभाग के अनुसार 
अच्छी बारिश जुलाई में हो सकती है , 
पर  इस साल  की बारिश औसत से कम होगी ) 



Sunday, June 22, 2014

रेलगाड़ी ...छुक छुक छुक छुक



रेलगाड़ी रेलगाड़ी
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
बढ़ा किराया दिल मेरा बोले 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 



हम भी कभी रेल से थे जाते 
यहाँ वहाँ यात्रा कर आते 
पैसे देकर टिकट थे लाते 
जो च जाते  वो घर ले जाते 
अब तो जो हम लेकर जाते 
वो पैसे भी हैं कम पड़ जाते 

रेल बुलाती आज भी हमको 
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
पर जेब बेचारी है ये कहती 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 

कभी रेल का सफ़र था मजा
अब तो रेल का सफ़र है सजा  
क्यूंकि सस्ते में था हो जाता
रोटी के लिए भी कुछ बच जाता
कमरतोड़ महंगाई से निकला दम
कोई सस्ता रस्ता नज़र नहीं आता

 रेल बुलाती आज भी हमको 
छुक छुक छुक छुक
छुक छुक छुक छुक
पर जेब बेचारी है ये कहती 
रुक रुक रुक रुक 
रुक रुक रुक रुक 

....रजनीश (22.06.2014)
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