Saturday, December 12, 2015

मौसम , माहौल और प्रदूषण

[1] ठंड का मौसम

छोटे हो गए दिन अब लंबी ठंडी रातें एक साल की बिदाई नए साल की बातें


[2] प्रदूषण और सम विषम

बारह बजने को हुए रात , बॉर्डर दिल्ली का किया पार अब करना कार से वापस घुसने दिनभर का तुम इंतज़ार


[3] प्रदूषण और सम विषम

तुम्हारी कार सम और मेरी है विषम, आज चलूँ मैं कल चलो तुम इस आज-कल में थोड़ा भ्रम थोड़ा गम ,क्या होगा प्रदूषण कम


[4] प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग

मत उड़ा हर फिक्र को तू धुएँ में मेरे यार खतरा है ग्लोबल-वॉर्मिंग का बन जा समझदार

[5] फ्रांस

दहली फिर मानवता देखो धमाकों और चीत्कारों से मिट न सकेंगे ये धब्बे काले दिल की रोती दीवारों से


.......रजनीश ( 12.12.15)

Sunday, November 29, 2015

धुंध

अब सूरज को
रोज ग्रहण लगता है
सूरज लगता है निस्तेज
सूरज की किरणों पर तनी
इक  चादर मैली सी
जिसे ओढ़ रात को  चाँदनी भी
फीकी होती दिन-ब-दिन
धुंध की चादर फैली
सड़कों गलियों से
जंगलों और पहाड़ों तक
कराती है एहसास
कि हम विकसित हो रहे हैं ...
....रजनीश (29.11.15)



Sunday, November 22, 2015

दीवाली


दीवाली
जब आ रही थी 
तो हर गली -मोहल्ले 
हर घर-चौराहे 
कहीं भी खड़े हो 
सुन सकता था आहट 
कि आ रही थी दीवाली 

हवा में मीठी  महक
हर चेहरे में थी ललक 
हर कहीं रोशनी की चमक 
हर दिन तेज होती पटाखों की धमक 
रंगोली के रंग सजा 
हर घर का दरवाजा 
करता था इशारा 
कि आ रही है दीवाली

फिर दीयों की लड़ियाँ लिए 
हाथ में फुलझड़ियाँ लिए 
लक्ष्मी को संग लिए 
खुशियाँ उमंग लिए 
आ गई दीवाली

कब से इंतज़ार था 
मन में खुमार था 
कब से दिल तैयार था 
तो खूब जिया दीवाली
स्वागत में लक्ष्मी के 
दिये जले 
पटाखे चले 
मिठाई बंटी  
गले मिले 

फिर सो गया थक कर
मैं क्या  सारा शहर 
पटाखों की गूंज 
घुस गई सपनों में 
धीमी होकर 
खत्म हुआ तेल 
सो गए दिये बुझकर 

हवा में बसी बुझे दीयों  की गंघ 
और बेहिसाब चले पटाखों का धुआँ 
नींद खुली सुबह तो एहसास हुआ 
कि जा चुकी थी दीवाली 

मुझे लगा था कुछ दिन तो रहेगी 
कितनी तैयारियां की थीं 
कितना इंतज़ार किया था 
और अब हर गली मोहल्ले 
हर घर चौराहे में चीखते निशान 
कि जा चुकी थी दीवाली 

आखिर रुकती क्यों नहीं 
कुछ दिन थमती क्यों नहीं दीवाली 
शोहरत से नहीं पैसों से भी नहीं 
शायद न ऐसी हमारी किस्मत 
और ना ही ऐसी फितरत 
ऐसा हमारा दिल ही नहीं 
हम ही नहीं रोकते उसे 
हर दिन हर हाल में 
हम नहीं मना सकते दीवाली
और हर साल चली जाती है दीवाली 

शुक्र है कि हर साल आ जाती है दीवाली 
और गर दिल से बुलाओ तो 
किसी भी दिन आ जाती है दीवाली 
....रजनीश (22.11.15)

Friday, November 13, 2015

त्यौहारों के मौसम में


[1] inflation
त्यौहारों के मौसम में पंचतारा रेसिपी बेमिसाल सरसों तेल में प्याज के तड़के वाली अरहर दाल

[2] Election
किसी को लगा चूना, कोई गया चुना डूबी कहीं नैया और पार कहीं नाव बिहारी या बाहरी , बहार या बाहर छोड़ो भी ये सब,अब हो गया चुनाव

[3] Diwali
नकली मिठाई हुए महंगे पटाखे क्या मनेगी दिवाली सूखे दिये जला के

[4] Diwali
खूब की थी रोशनी फिर बस मकां रह गया
खूब चले थे पटाखे अब सिर्फ़ धुआं रह गया

[5] World Internet Day 29th Octber
अंतर्जाल का दुनिया भर में फैला मायाजाल
कुछ ही पलों में नेट बिना होता हाल बेहाल

[6] World Thrift Day 30th october
बचपन की गुल्लक है साथ अब भी सिक्के और यादें भरा इक खिलौना जतन से इसी के सीखा था मैंने बचाना बढ़ाना और सपने संजोना

[7] Run for Unity 31st October
आज देश के लिए दौड़ें साथ वैमनस्य का छोड़ें ना भूलें सदभावना सहिष्णुता दिल से दिल को भी जोड़ें
                                           ..रजनीश (13.11.15)
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