मैं तो चलता जाता हूँ
समय की धुन में
समय की सुनता
आगे बढ़ता जाता हूँ
मैं तो चलता जाता हूँ
कहाँ से चला पता नहीं
कहाँ जा रहा पता नहीं
कहाँ हमसफर पता नहीं
कहाँ है रास्ता पता नहीं
फिर भी चलता जाता हूँ
आशाओं की माला बुनता
आगे बढ़ता जाता हूँ
मैं तो चलता जाता हूँ
क्या है सच ये पता नहीं
क्या झूठ है पता नहीं
क्या सही था पता नही
क्या गलत था पता नहीं
फिर भी चलता जाता हूँ
भीतर की आवाज मैं सुनता
आगे बढ़ता जाता हूँ
मैं तो चलता जाता हूँ
क्या है धोखा पता नहीं
कोई खोजे मौका पता नहीं
कौन है अपना पता नहीं
कौन सहारा पता नही
फिर भी चलता जाता हूँ
ढाई आखर प्रेम के पढ़ता
आगे बढ़ता जाता हूँ
मैं तो चलता जाता हूँ
मैं तो चलता जाता हूँ
जिंदगी
तू है जिंदगी आसां जरा भी मुश्किल नहीं पर ये जाना
ख्वाहिश अपने ढंग से जीने की, तुझे दुश्वार बना देती है
सपने
सपने छोटे ही अच्छे बड़े की कीमत भी बड़ी होती है
हो सपना कोई भी पूरा खुशी तो हमेशा पूरी होती है
गम
करते हैं गम का शुक्रिया खुशी से पहचान कराने का
वो भी बार बार आकर खुश रहना सिखा जाता है
गुस्से को समझो
गुस्से को आने दो पर गुस्से को जाने दो
समझो क्या कहता है पर घर ना बनाने दो
हम खुद
हम देखते हैं वो दिखता नहीं जो देखने पर
जबसे देखा है खुद को बैठ आईने के भीतर
गली-गली शहर-शहर
ये हर कहीं का हाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
किसी के लिए आस्था
किसी के लिए परंपरा
किसी के हाथ हक के लिए
जल रही मशाल हैं
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
किसी के लिए कचरा
किसी के लिए मौका
किसी के हाथ तख्ती लिए
भूख से बेहाल हैं
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
किसी के लिए बाजार
किसी के लिए प्रचार
किसी के लिए प्रदूषण
साँसों का सवाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
किसी के लिए शोहरत
किसी के लिए ताकत
किसी के लिए वजूद
और अस्मिता का सवाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
स्वार्थों के फेरे में
झूठे सवालों के घेरे में
सच का गला घुंट रहा
बस यही मलाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं
गली-गली शहर-शहर
ये हर कहीं का हाल है
...रजनीश (31.01.16)
कुछ रास्तों पर
मील का पत्थर होता नहीं है
और कोई हम सफर भी मिलता नहीं है
फिर भी इन रस्तों पर
भटकते-बिखरते
क्या जाने कदम क्यूँ चलते जाते हैं
एक पन्ने पर
जो लिखा है वो बदलता नहीं है
नया कोई पन्ना भी मिलता नहीं है
फिर भी कुछ किताबों को
पन्ने दर पन्ने
क्या जाने नयन क्यूँ पढ़ते जाते हैं
एक सपने में
जो गाया वो सच होता नहीं है
जो सपने मे पाया वो मिलता नहीं है
फिर भी कुछ सपनों को
जागते और सोते
क्या जाने हम क्यूँ देखते जाते हैं
मतलबी शहर में
कोई अपना होता नहीं है
ढूँढने से भी हमदम कोई मिलता नहीं है
फिर भी एक पते को
दर-दर खोजते
क्या जाने हम क्यूँ पूछते जाते है
.......रजनीश (24.01.16)
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