Wednesday, October 28, 2020

जरूरतों का गणित

जिंदगी अकेली नहीं
जिंदगी की साथी है जरूरत
चोली दामन का साथ 
कुछ ऐसा है जैसे 
जिंदगी का दूसरा नाम है जरूरत 

जिंदगी के लिए जिंदा रहना जरूरी है 
जिंदा रहने के लिए बहुत कुछ जरूरी है 
जरूरतों के बिना जिंदगी नहीं 
जिंदगी है तो जरूरी है जरूरत 

जिंदगी एक पहेली है ठीक वैसी
जैसा है जरूरतों का हिसाब किताब 
जरूरतों का गणित 
कितना अजीब है 
जरूरतों का जाल 
जिंदगी का नसीब है 

जरूरतों का जोड़ - घटाव 
जरूरतों का गुणा - भाग 
किताबों में वर्णित नहीं 
जरूरतों का सीधा - सीधा गणित नहीं 

एक जरूरत , 
जरूरत ही नहीं रह जाती 
जब कोई और 
जरूरत आ जाती है 
जिसकी कभी जरूरत ही नहीं थी 
वो कभी पहली जरूरत 
बन जाती है 

एक जरूरत में 
दूसरी जरूरत मिल जाने से 
जरूरत ही खत्म हो जाती है 
कभी कई जरूरतों को 
आपस में जोड़ने से 
एक जरूरत बन जाती है 

जरूरतें पूरी भी होती हैं 
पर जरूरतें खत्म नहीं होतीं
जरूरतें थोड़ी भी लगें तो 
जरूरतें कम नहीं होतीं
 जरूरतों की कीमत होती हैं 
 कुछ जरूरतें बेशकीमती होती हैं

जरूरतों को जानना होता है
कुछ जरूरतों को भुलाना होता है 
जरूरतों को मानना होता है 
कुछ जरूरतों को मनाना होता है 

गणित में 
एक तरफ शून्य होता है 
दूसरी तरफ अनंत 
एक तरफ कुछ नहीं 
दूसरी तरफ सब कुछ पूर्ण 
पर जरूरत का सिद्धांत 
तो अपूर्णता का सिद्धांत है 
क्यूंकि जरूरतें अनंत है  
पर जरूरतें अपूर्ण हैं 
अनंत भी हैं और अपूर्ण भी हैं

जब तक जिंदगी है 
जरूरतें अपूर्ण ही रहती हैं 
जरूरतें ख़तम 
तो जिंदगी ख़तम 

जिंदगी और जरूरत 
दोनों को एक दूसरे की जरूरत है 
एक समीकरण है 
दोनों के बीच 
जिसका हल मिलता नहीं 
गणित की किताबों में

.....रजनीश ( २८.१०.२०२०, बुधवार)

10 comments:

Sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३० अक्टूबर २०२० के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

Sweta sinha said...

आदरणीय सर,
ब्लॉग में कमेंट अप्रूवल लगाने से पाठक प्रतिक्रिया देने से कतराते हैं। निवेदन है कृपया कमेंट अप्रूवल पर विचार करें।
सादर।

Onkar said...

बहुत सुन्दर

शिवम् कुमार पाण्डेय said...

बहुत अच्छा।

विभा रानी श्रीवास्तव said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

Anuradha chauhan said...

बेहतरीन रचना

Meena sharma said...

वाह ! जिंदगी में सारी जरूरतें खत्म हो जाएँ तो भी कुछ जरूरतें तो रहेंगी ही.... जैसे साँस लेने के लिए शुद्ध हवा की जरूरत!
जरूरतों की भूलभुलैया को कविता में बखूबी उतारा है। सादर।

रेणु said...

बहुत खूब! जीवन और उसकी जरूरतों का समीकरण ही सृष्टि का आधार है. समग्र चिंतन से उपजा सार्थक सृजन 👌👌👌👌

मन की वीणा said...

जिंदगी और ज़रूरत पर सार्थक चिंतन देती सहज रचना।
सुंदर।

पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....