[1]
डांस-बार फिर खुले अगर
वही होगा जो पहले देखा
श्लील-अश्लील के बीच
कहाँ पर खींचें लक्ष्मण-रेखा
[2]
कल के सपने बुन रहा है बिहार अभी चुन रहा है
वादे बकझक सुन रहा है बिहार अभी चुन रहा है
[3]
फिर कुछ सुबहें खास हो गईं
अपनी मैगी पास हो गई
[4]
सेल-डील के चक्कर में, गए अकल लगाना भूल
अक्टूबर के महीने में यारों, बन गए एप्रिल-फूल
[5]
आग लगी हो घर हमारे
तो कौन दुआरे आयेगा
हमारी खुशियों की खातिर
क्यूं अपने हाथ जलायेगा
..........रजनीश (18.10.2015)
अपने सफ़र में
आगे की ओर ही
मेरे कदम निकले
ऐसा तो नहीं
एक ही रास्ते पर चले
ऐसा तो नहीं
कहीं ना मुड़े
ऐसा तो नहीं
कहीं ना फ़िसले
ऐसा तो नहीं
कभी ना हों थके
ऐसा तो नहीं
कई बार मेरे कदम ठिठके
सोचा कि फिर से करें शुरू
एक नई कोशिश
एक नई इबारत नया पन्ना
पर रुकना ना हुआ
और सोचा
अधूरी लाइन कर लें पूरी
कई बार कदम मुड़े
और पहुँचे वापस वहीं
जहां था
कोई पिछला पड़ाव
जहां से शुरू की थी
एक नई कविता
एक नई कहानी
सोचा इसे नया नाम दें
नया रूप नया रंग दें
कई बार कदम चलते रहे
एक गोल घेरे में
और खाते रहे चक्कर
इस मुगालते में
कि हैं किसी सीधे रास्ते पर
इस बात से बेखबर
कि पैरों तले जमीन
तो बदल ही नहीं रही
जैसे एक ही लाइन
एक ही पन्ना
आ जाये नज़रों में बार-बार
कभी वक़्त को रोकने की जुगत में
कभी वक़्त से बचने की जुगत में
कदम रुक भी गए, पर
वक़्त धकेलता रहा कदमों को
ना जाने कितनी बार
कितने मोड़ों पर
कदमों ने की कोशिश
कि बदल लें रास्ते
महसूस कर लें
कोई नई जमीन
कोई नई दिशा
कोई नई कहानी
कोई नई कविता
शुरू हो जाये
सफ़र के भीतर
कोई नया सफ़र
कई बार कदमों ने
खोजा और पाया भी
नया रास्ता
पर मीलों चलकर
घूम-फिर कर
थक-कर
आ गए उसी पुरानी
कुछ अपनी ही लगती
पगडंडी पर
लौट आया हो जैसे कोई
परदेश से वापस अपने देश
और कदमों को लगा
कुछ भी हो
यही है अपना
अपना तो यही रास्ता है
यही है अपनी नियति
हाँ , इतना जरूर हुआ
कि कदम जान गए
कई रास्तों को
उम्मीद भरे शहरों को
कदम वाकिफ़ हो गए
रास्तों भरी खूबसूरत
ज़िंदगी की वादियों से
कि चलो ये भी हैं
कुछ रास्ते
हम ना सही
कोई और कदम तो हैं इनपर
और हाँ
इस बात की
होती है खुशी
और मिलता है सुकून भी
कि कुछ भी हो
कुछ भी हुआ हो
शायद ये ही है नियति कि
अब भी
कदम रुकते नहीं, बस
चलते रहते हैं
चलते रहते हैं
आशा और विश्वास के साथ
कदम ढूंढते ही रहते हैं
नई नई मंज़िलें
नई नई राहें
..........रजनीश (21.04.2015)
एक हथेली पर
रखे हुए कई बरसों से
ज्यादा भारी हो जाता है
कभी कभी
दूसरी हथेली पर रखा
एक पल
पैरों से टकराते
अथाह सागर से
बड़ी हो जाती है
कभी कभी
अपने भीतर महासागर लिए
कोने से छलक़ती
...एक बूंद
खुले आकाश में
भरी संभावनाओं सी
अनंत हवा से
कीमती हो जाती है
कभी कभी
जीवन की छोटी सी
...एक सांस
बड़े-बड़े
दरख्तों की छांव से
ज्यादा सुकून देता है
कभी कभी
छोटा सा
...एक आँचल
आसमान छूते बड़े
सुनहरे महलों से
ज्यादा जगह लिए होता है
कभी कभी
मुट्ठी बराबर
...एक दिल
ज़िंदगी की बड़ी
उलझन भरी बातों से
बड़ी हो जाती है
कभी कभी
छोटी सी
...एक बात
....रजनीश (19.04.15)
एक वक्त
ऐसा भी होता है
जब दिन गुजरता जाता है
घड़ी की सुई की तरह
बिना ठहरे कहीं भी कुछ घड़ी
बस कोल्हू की मानिंद
ज़िंदगी की सुई एक दायरे में
घूमती चली जाती है
जैसे पंखों को फैलाये
बिना फड़फड़ाए
तैरता हो एक बाज हवा मेँ
कुछ ठहरता नहीं
पर ज़िंदगी ठहर जाती हो जैसे
एक ऐसा ठहराव
जिसमें सुकून नहीं
जिसमें आराम नहीं
जिसमें पड़ाव नहीं
जिसमें कुछ रुकता नहीं
और फिर ये वक़्त
एक आदत बन जाता है
.......रजनीश (15.04.15)
पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....