Thursday, June 15, 2017

चलो कुछ तो है


ईश्वर का  पता नहीं
पर आस्था तो है
मंजिल का पता नहीं
पर रास्ता तो है
न्याय का  पता नहीं
पर अदालत तो है
सजा का तो पता नहीं
पर हिरासत तो है
जीत का पता नहीं
पर हौसला तो है
क्या सही-गलत पता नहीं
पर फैसला तो है
कौन अपना है पता नहीं
पर लगाव तो है
मंजिल समंदर है पता नहीं
पर बहाव तो है
..........रजनीश  (15/06/17)

Sunday, June 11, 2017

क्यों किसान रोता है

क्यों किसान रोता है
सबका अन्नदाता
आएदिन
क्यों भूखे पेट सोता है
क्यों किसान रोता है
जीवन भर
जीवन से लड़ता
यकायक  जीवन
खत्म करता है
क्यों किसान रोता है
घटती जमीन
बढ़ता कर्जा
अपना पसीना बोता है
क्यों किसान रोता है
उधारी घटती नहीं
आय बढ़ती नहीं
बरस जाए बादल
बाट जोहता है
क्यों किसान रोता है
दुनिया चांद पर
समय बदलता
किसान अब भी
उसी जमीं पर
दिन-रात एक कर
अपने हल से
जीवन पहेली का
हल खोजता है
क्यों किसान रोता है

.............रजनीश  (11.06.17)

Monday, June 5, 2017

पर्यावरण दिवस













पर्यावरण दिवस
की जरूरत
तय  हो  गयी थी
उसी वक्त
जब पहली बार
पत्थर रगड़कर
आग बनाई थी हमने
पेड़ कभी याद आएंगे
तय हो गया था
उसी वक्त
जब पहला पेड़
काटा था हमने
बेदम हो जाएंगी साँसे
तय हो गया था
उसी वक्त
जब जल से हटकर
कोई द्रव
बनाया था हमने
शोषण होगा धरा का
ये तय हो गया था
उसी वक्त
जब कुछ तलाशने
पहली बार चीर
छाती धरा की
एक गड्ढा बनाया था हमने
ये सब तय था
क्योंकि हमारी दौड़ ही है
अधिक से अधिक
पा लेने की
जीवकोपार्जन के नाम पर
दोहन हमारा स्वभाव ,
दिमाग चलता है हमारा,
एक होड़ के शिकार हैं हम
क्योंकि,
विकासशील हैं हम
आविष्कारक हैं
अन्वेषक हैं
प्रगतिशील हैं
प्रबुद्ध और सर्वोत्कृष्ट
प्रजाति हैं हम
हमारी जरूरतें
हमारी जिम्मेदारियों से
हमेशा आगे रहीं हैं,
तो अब मनाते रहें
पर्यावरण दिवस
                ••••••रजनीश (05/06/17)

Thursday, June 1, 2017

मन, तू रहता है कहाँ

ओ प्यासे
खो जाने वाले
बिना ही बात 
मुस्कुराने वाले
मन , तू रहता है कहाँ
ओ पगले
रुलाने वाले
जब-तब
मदहोश हो जाने वाले
मन, तू रहता है कहाँ
ओ भंवरे
खूब बहकने वाले
प्यार के गीत पर
चहकने वाले
मन, तू  रहता है कहाँ
ओ झूठे
बहकाने वाले
मंदिर भी
कहलाने वाले
मन, तू रहता  है कहाँ
ओ बच्चे
सब कुछ चाहने वाले
सीमा -रेखाएँ लांघने वाले
मन, तू रहता है कहाँ
मन तू आखिर है कहाँ 
मुझसे मुझे चुराने वाले
बस में मेरी न आने वाले 
भला-बुरा दिखलाने वाले
ओ आईना कहलाने वाले 
सच है गर यारी हमारी 
बता देह में जगह तुम्हारी
आँखे तो बस
देखती हैं प्यार से
कान सुनते बस धड़कन
जुबां सुनाती बातें
हाथ पकड़ते कम्पन
हर अंग तुम्हारी चुगली करता
तू कहीं तो है ये हरदम लगता
मन, तू रहता है कहाँ
ढूंढते-ढूंढते थक गया मैं
भीग गया पसीने में
भेजे से तो बैर है तेरा
क्या रहता है तू सीने में
पर सीने में तो दिल है
उसका जीने से सरोकार
वो तो बस दे रहा
लहू को रफ्तार
वहां कहाँ है
गंगा-जमुना
वहां तो बस रक्त है
जान ही लूंगा
भेद मैं तेरा
अभी भी काफी वक्त है 
  ...........रजनीश  (01/06/17)

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