Tuesday, March 7, 2017

मैं तो चलता जाता हूँ


मैं तो चलता जाता हूँ 
समय की धुन में
समय की सुनता 
आगे बढ़ता जाता हूँ 
मैं तो चलता जाता हूँ 

कहाँ से चला पता नहीं 
कहाँ जा रहा पता नहीं 
कहाँ हमसफर पता नहीं 
कहाँ है रास्ता पता नहीं 
फिर भी चलता जाता हूँ 
आशाओं की माला बुनता 
आगे बढ़ता जाता हूँ 
मैं तो चलता जाता हूँ 

क्या है सच ये पता नहीं 
क्या झूठ है पता नहीं 
क्या  सही था पता नही 
क्या गलत था पता नहीं
फिर भी चलता जाता हूँ 
भीतर की आवाज मैं सुनता
आगे बढ़ता जाता हूँ 
मैं तो चलता जाता हूँ 

क्या है धोखा पता नहीं 
कोई खोजे मौका पता नहीं 
कौन है अपना पता नहीं 
कौन सहारा पता नही 
फिर भी चलता जाता हूँ 
ढाई आखर प्रेम के पढ़ता
आगे बढ़ता जाता हूँ 
मैं तो चलता जाता हूँ 

मैं तो चलता जाता हूँ
                                                 

Friday, February 3, 2017

जिंदगी- सपना- गम- हम


 जिंदगी
तू है जिंदगी आसां जरा भी मुश्किल नहीं पर ये जाना
ख्वाहिश अपने ढंग से जीने की, तुझे दुश्वार बना देती है


सपने
सपने छोटे ही अच्छे बड़े की कीमत भी बड़ी होती है
हो सपना कोई भी पूरा खुशी तो हमेशा पूरी होती है


 गम
करते हैं गम का शुक्रिया खुशी से पहचान कराने का
वो भी बार बार आकर खुश रहना सिखा जाता है


गुस्से को समझो
गुस्से को आने दो पर गुस्से को जाने दो
समझो क्या कहता है पर घर ना बनाने दो


हम खुद
हम देखते हैं वो दिखता नहीं जो देखने पर
जबसे देखा है खुद को बैठ आईने के भीतर


Sunday, January 31, 2016

सवाल ही सवाल

गली-गली शहर-शहर
ये हर कहीं का हाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए  सवाल ही सवाल हैं

किसी  के लिए आस्था
किसी के लिए परंपरा
किसी के हाथ हक के लिए
जल रही मशाल हैं
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं

किसी के लिए कचरा
किसी के लिए मौका
किसी के हाथ तख्ती लिए
भूख से बेहाल हैं
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए  सवाल ही सवाल हैं

किसी के लिए बाजार
किसी के लिए प्रचार
किसी के लिए प्रदूषण
साँसों का सवाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं

किसी के लिए शोहरत
किसी के लिए ताकत
किसी के लिए वजूद
और अस्मिता का सवाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं

स्वार्थों के फेरे में
झूठे सवालों के घेरे में
सच का गला घुंट रहा
बस यही मलाल है
उलझनों में कस रहे
हर किसी को डस रहे
झकझोरते खड़े हुए सवाल ही सवाल हैं

गली-गली शहर-शहर
ये हर कहीं का हाल है
...रजनीश (31.01.16)

Sunday, January 24, 2016

उम्मीदें

कुछ रास्तों पर 
मील का पत्थर होता नहीं है  
और कोई हम सफर भी मिलता नहीं है 
फिर भी इन रस्तों पर 
भटकते-बिखरते 
क्या जाने कदम क्यूँ चलते जाते हैं

एक पन्ने पर 
जो लिखा है वो बदलता नहीं है 
नया कोई पन्ना भी मिलता नहीं है 
फिर भी कुछ किताबों को
पन्ने दर पन्ने 
क्या जाने नयन क्यूँ  पढ़ते जाते हैं 


एक सपने में 
जो गाया वो  सच होता नहीं है 
जो सपने मे पाया वो मिलता नहीं है 
फिर भी कुछ सपनों को 
जागते और सोते 
क्या जाने हम क्यूँ देखते जाते हैं 

मतलबी शहर में 
कोई अपना होता नहीं है 
ढूँढने से भी हमदम कोई मिलता नहीं है 
फिर भी एक पते को 
दर-दर खोजते 
क्या जाने हम क्यूँ पूछते जाते है 

.......रजनीश (24.01.16)

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