Saturday, May 11, 2013

बूंद मेँ समंदर














अपने अरमानों जैसे
ऊंचे पर्वत की तलहटी में
घास के बिछौने पर
प्रेम से औंधे  लेटकर
अपने हाथ फैलाए हुए
देखता हूँ अनगिनत तारों को

जमीन के एक कण के रूप में
जमीन से जुड़े होने का एहसास
अथाह ब्रह्मांड के विस्मयकारी दृश्य संग
उस असीमित को पा लेने
घास के तिनके सा हृदय आंदोलित होता है
सूक्ष्मता और विशालता के बीच
शक्ति की सीमाएं खोजता

सुनहरी रेत के समंदर में खड़े
पैरों से  टकराता है दूसरा  समंदर
रेत को संग लिए
वापस जाती लहर में बैठ
आँखें नजारा करती हैं
अथाह अनंत सागर
उस असीमित को पा लेने
 रेत के कण सा हृदय आंदोलित होता है
सूक्ष्मता और विशालता के बीच
शक्ति की सीमाएं खोजता

फिर होता है एक कंपन
जो पर्वत और समंदर की
बदल देता है सीमाएं
टूट जाता है पर्वत
छिछला हो जाता है समुद्र
शक्ति का प्रदर्शन
एकअणु  का विस्फोट
महाविनाश करता है
उस असीमित को रोक लेने
एक अणु सा हृदय दोलित होता है
सूक्ष्मता और विशालता के बीच
शक्ति की सीमाएं खोजता

खोज बाहर और खोज भीतर भी
विनाश और विकास की मंज़िलें
दिलाती है ये अहसास कि
असीमित शक्ति बाहर भी है और भीतर भी
विशालता बाहर भी है और भीतर भी
पर्वत बाहर भी है और भीतर भी
समंदर बाहर भी है और भीतर भी
ब्रह्मांड बाहर भी है और भीतर भी
एक सागर पानी की बूंद में है
एक पर्वत एक कण में
एक अणु में एक सूर्य है
जैसे एक शब्द में महाकाव्य है

शक्ति दायक ऊर्जा है हर कहीं
सूक्ष्मता और विशालता गुंथी है ऊर्जा में
उत्पत्ति और विनाश ऊर्जा में समाये
ऊर्जा से बनता दोनों का रास्ता
ऊर्जा है जरूरी गौणता से विशालता की यात्रा में
ऊर्जा है माध्यम और ऊर्जा ही है मंज़िल
ऊर्जा की खोज है विज्ञान
ऊर्जा को पा लेना है विकास
रथ के पहिये हैं तकनीक
ध्वंस की दिशा गौणता की यात्रा है
निर्माण की दिशा विशालता की यात्रा है
रथ विज्ञान है , अश्व ऊर्जा है और हम सारथी हैं .....

....रजनीश (11.05.2013)

11th मई  National Technology Day
के रूप मेँ मनाया जाता है । 
1998 मेँ आज के ही दिन पोखरण-II विस्फोट
- (आपरेशन  शक्ति )किए गए थे ।
1974  में  हुआ  पोखरण -विस्फोट
आपरेशन " बुद्ध स्माइलिंग " कहा गया । 

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रकृति ने ऊर्जा और साधन, दोनों ही दिये हैं, साथ ही दी है बुद्धि हमें, संदोहन की। सुन्दर कविता।

Kailash Sharma said...

बहुत गहन और सुन्दर अभिव्यक्ति...प्रकृति ने हमें विनाश और विकास दोनों के साधन दिये हैं, यह हम पर निर्भर है हम किसे चुनते हैं...

रचना दीक्षित said...

सीमायें जब परिसीमित ना रहें विनाशकारी और विध्वन्षक हो सकती हैं. सुंदर प्रस्तुत्ति.

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