Sunday, June 16, 2013

नई बारिश



मुझे याद है
वो सुलगती हुई
एक सुनसान दोपहर
जब मैं मुखातिब था उस पेड़ से
जो झुलसा हुआ सूखा-सूखा
खड़ा हुआ था राह किनारे
अपनी ज़िंदगी की डोर थामे
पत्तियों ने भी छोड़ दिया था उसका साथ
वीरानी का घर बस गया था
उसकी डालों  पर
और झलकती थी
प्यास हर सिरे से ,
मै पास खड़ा कुछ तलाश रहा था उसमें
एक आईना बन गया था वो पेड़ ,

और आज बारिश हो रही थी
भीगने की तमन्ना
इंतज़ार ही कर रही थी
इन बादलों का
इसी चाहत को साथ लिए
उसी राह से गुजरा
सोचा कुछ  गम ही बाँट लूँ
संग उसी पेड़ के ,
पर वो खेल रहा था
नई हरी पत्तियों संग
पत्तों पर गिरती बूंदों में
सुनाई दे रही थी पेड़ की खिलखिलाहट
हवाओं में झूम रहा था
पानी में तरबतर वो पेड़
न थी कोई वीरानी न थी तनहाई
अधूरी प्यास भी नज़र नहीं आई
और एक आईना टूट कर
वहीं  बिखरा पड़ा था जमीन पर
वही बारिश मुझ पर भी गिरी
पर  भिगा ना सकी थी मुझे
.....रजनीश (16.06.2013)



   

10 comments:

Anonymous said...

Good post .. Thx to the author

Jyoti Mishra said...

Happy monsoon :)
loved the concluding lines..
Rain has a way making us all emotional. we just connect with it somehow.

रचना दीक्षित said...

वारिश भी उम्मीद की तरह से आती. आ गयी तो उमीदें पूरी, नहीं तो अगली वारिश का इन्तेज़ार.

सुंदर कविता, अनुपम भाव.

Shalini Rastogi said...

वही बारिश मुझपर भी गिरी
पर भिगो न सकी मुझे
..वाह ... बहुत खूबसूरत भावों से परिपूर्ण कविता !

Ritesh Agarwal said...

rajnish sir...aapne puraani yaadein taaza kar di :)

Anupama Tripathi said...

गहन अभिव्यक्ति ....

प्रवीण पाण्डेय said...

हर पत्ती प्यासी है,
हर बूँद प्रवासी है।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत सुंदर लाजबाब भावों से परिपूर्ण प्रस्तुति,,,
RECENT POST: जिन्दगी,

dr.mahendrag said...

जो हारा न ज़िन्दगी से वही सिकंदर बन पाया.

dr.mahendrag said...

बहुत सुन्दर कहूँगा वे पंक्तियाँ जो कुछ दिन पहले पढ़ी थी
जो हारा न ज़िन्दगी से वही सिकंदर बन पाया.

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