Tuesday, April 15, 2014

चुनाव का त्यौहार


पाँच साल में एक बार आता ये त्यौहार 
चुने हुए चंद लोगो की बनती नई सरकार  

हर नेता बरगलाए जनता पर डाले डोरे
होता आया हर बार वादे निकलते कोरे

किसको दे दें वोट किसका समर्थन छोड़े
जनता  हुई परेशान दीवारों से सर फोड़े

मजबूती-कमजोरी में पिस गई जनता सारी
महंगाई मुंह फाड़े जनता भ्रष्टाचार की मारी

जनता है कनफ्यूज़ रस्ता कोई ढूंढ न पाये
नेता चीखें “बरबादी” हल कोई बता न पाये

सत्ता का है खेल, मकसद है कुर्सी पाना
नहीं बदलना और वोटर को उल्लू बनाना

मत देकर भेजो सही, गलत को मत ना देना
मत देना ज़िम्मेदारी,  मौका मत जाने देना 
.........रजनीश (15.04.14)

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

एक बार बाहर का रास्ता दिखा दो कबूतरों को
बहुत बार भेज चुके हो बार बार उन्हीं चोरों को ।

सुंदर :)

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन भंडारा - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

Sateek Panktiyan....

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