Monday, March 21, 2011

होली के बाद

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क्या बताऊँ तुम्हें,
क्या खूब होली थी ,
क्या रंग चढ़ाया था यारों ने ,
सबको गले लगाया,
उसे भी सराबोर किया रंगों में,
याद नहीं गुलाल लगे
कितने गुझिए खा गया मैं,
नंगे पैर भंग की तरंग में
नाचता रहा  नगाड़े के फटने तक,
और फिर नशे को फाड़ा घंटों बैठ,
नींबू और पता नहीं क्या-क्या ...
जुगत तो बहुत लगाई थी
कि रंग कोई ना चढ़े,  पर
ज़ालिमों ने न जाने कौन सा रंग लगाया था,
चार घंटे घिस-घिस के जब छिल गई चमड़ी
तब कहीं उतरे ये रंग,
बड़ी मेहनत के बाद उतरी होली ,
देखो एक कण भी नहीं बचा
अब किसी रंग का ...
तुम नहीं कह पाओगे अब मुझे देख
कि वो जो झूम रहा था,
रंगों में डूबा जो प्रेम बाँट रहा था,
रंगों में घुल सब के संग-
एक हो गया था
वो मैं था ,
नहीं ,अब मुझे देख यह तुम कह नहीं पाओगे ...
कि मैंने होली खेली थी ...
  ...रजनीश (21.03.11)

3 comments:

यशवन्त माथुर said...

बेहतरीन!

Manpreet Kaur said...

बहुत ही सुंदर रचना है जी ! बहुत ही अच्छा पोस्ट है आपका !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये !
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Dr (Miss) Sharad Singh said...

तुम नहीं कह पाओगे अब मुझे देख
कि वो जो झूम रहा था,
रंगों में डूबा जो प्रेम बाँट रहा था,
रंगों में घुल सब के संग-
एक हो गया था
वो मैं था .....

बहुत सुन्दर कविता....
हार्दिक बधाई...

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