Saturday, August 20, 2011

खालीपन

एक शून्य नज़र आता है
कभी कभी मन की
चहारदीवारी पर 
धीरे धीरे पूरा मन
डूब  जाता है
शून्य की दीवार के अंदर
और बाहर ही नहीं आता
उस दीवार के सहारे
पीठ टिकाये मैं सो जाता हूँ 
कभी लगता है
ऊंचाई से कूद गया
फ्री-फॉल  की तरह
मैं चलता रहता हूँ
आँखें मूँदे बस ढलान पर लुढ़कती
एक गेंद की तरह
और गेंद जब रुकती है
ढलान खत्म होने पर
शून्य जा चुका होता है
तब पलटना होता है
उस ढलान पर और
एक चढ़ाई करनी पड़ती है
वो शून्य आता कहाँ से है
पता नहीं चलता
वैसे इस शून्य को
हर मन में आते-जाते देखा है ...
....रजनीश ( 20.08.2011)

14 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन चिंतन ... शून्य से फिर आरम्भ होता है

Anita said...

वाह बहुत सुंदर चित्रण किया है ध्यान जैसी स्थिति का... वह शून्य ही तो हमारा घर है... असली घर जहां हर रोज हम नींद में चले जाते हैं...

रेखा said...

सार्थक प्रस्तुति ....

Kailash C Sharma said...

गहन चिंतन...रचना पढते हुए एक असीम शून्य का अनुभव होता है...बहुत सुन्दर

अनामिका की सदायें ...... said...

dhalaan par pahuch kar fir chadhayi karna dushkar kary hai aur iske liye shoony se baahar aana hi padega.

gehen abhivyakti.

yahan bhi aaka swagat hai.

http://anamka.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html

Dr (Miss) Sharad Singh said...

गहन जीवन दर्शन है आपकी इस रचना में...

दिगम्बर नासवा said...

जीवन के उतर चड़ाव और मन के गहरे में आई रिक्तता को बाखूबी लिखा है रजनीश जी ...

सागर said...

saargarbhit rachna....

सागर said...

saargarbhit rachna....

रचना दीक्षित said...

सच हितों है सबके ही जीवन में आता है ये शून्य
पर कई बार सोचती हूँ कि शायद एक शून्य को दूसरा शून्य ही भर सकता है.
आभार

Mayank Mishra said...

मन के द्वन्द्व को शब्दों में बखूबी बयान किया है।

Saru Singhal said...

Thinking deep within yourself give us meaning but sometimes meandering thoughts, very beautiful poem.

सतीश सक्सेना said...

जन्माष्टमी की शुभकामनायें स्वीकार करें !

हरकीरत ' हीर' said...

एक शून्य नज़र आता है
कभी कभी मन की
चहारदीवारी पर
धीरे धीरे पूरा मन
डूब जाता है
शून्य की दीवार के अंदर

shuruaati पंक्तियाँ बहुत achhi lagin ......

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