Friday, August 26, 2011

खोने का अर्थशास्त्र

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सूरज की रोशनी में
चमकता एक खूबसूरत फूल
बिखेरता है खुशबू
बस एक स्वार्थ उसका
कि और लग सकें फूल कहीं
पर जबर्दस्ती नहीं करता कभी ,
कल कल बहता झरना
एक बूंद पानी भी
नहीं रखता अपने लिए
पानी का बह जाना
ही है उसका होना
आकाश में उड़ता बादल
एक-एक बूंद बरस जाता है
आखिरी बूंद के साथ
हो जाता है खत्म
पर वो बरसता है 
ताकि बन सके एक बार फिर से
किसी छत पर बरसने के लिए
पर हम कुछ सीख न सके
फूल से , झरने से , बादल से
और बस लड़ते हैं
अपने अस्तित्व
अपने अहम की लड़ाई
कुछ पाने के लिए
पर दरअसल खोने में है  पाना
.....रजनीश (26.08.2011)

8 comments:

अनामिका की सदायें ...... said...

sach kaha lekin insan sirf paane ka kayda padh kar aaya hai aur tammam umr isi paane ke chakrvyooh me fansa rahta hai...kash insan prakriti se kuchh seekh le le.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खोने से पाने का अर्थशास्त्र अच्छा लगा .. अच्छी प्रस्तुति

रश्मि प्रभा... said...

sach hai...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

सुन्दर प्रस्तुति

देवेश प्रताप said...

लाजवाब प्रस्तुति ....

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।

http://tetalaa.blogspot.com/

Anita said...

प्रकृति से यदि इंसान कुछ सीख सके तो यही कि जो देगा वही पायेगा ... सुंदर कविता !

दिगम्बर नासवा said...

खोने में ही पाना है ... सच है अगर यही समझ से इंसान तो शान्ति आ जायेगी चित में ...

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