Saturday, November 26, 2011

छलावा

2011-11-15 17.34.22
तुम्हें जो खारा लगता है
वो सादा पानी होता है
समझते हो कि आँखों से
मेरा ये दिल टपकता है
मेरे आँसू क्या सस्ते हैं
गैरों के दर्द पर रोएँ
दिल नहीं दिखावा है
वही भीतर से रोता है

फंसा तो खुद में ही मैं हूँ
मुझे तो फिक्र अपनी है
परेशां खुद से ही मैं हूँ
तुम्हारी सुध मैं कैसे लूँ
मुझे फुर्सत कहाँ तुम्हारी
तकलीफ़ों पर मैं  रोऊँ
मेरा करम मेरे सीने में
हर दिन दर्द पिरोता है

होता वो नहीं  हरदम
नज़रों से  जो दिखता है
छलावा है जहां, जिसमें
भरम का राज होता है
खेलते हो  जब भी होली
किसी की सांस छीन कर तुम
लाल वो रंग नहीं होता
किसी का खून होता है

खुद को दोष क्या दूँ मैं
शिकायत क्या तेरी  करूँ
मुझे हर कोई मुझ जैसा
खुद में खोया लगता है
था बनने चला जो ईंसां
ज़िंदगी की राहों पर
जानवर रह गया बनकर
हरदम अब ये लगता है
.....रजनीश (26.11.2011)

17 comments:

Seema said...

Beautiful poem with a eautiful picture

Onkar said...

बहुत गहरा विश्लेषण

सदा said...

वाह ...बहुत बढि़या।

वन्दना said...

्बेहतरीन प्रस्तुति।

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi badhiyaa ... her koi khud me khoya sa lagta hai

Kailash C Sharma said...

सब अपनी दुनियां में खोये हैं...बहुत भावपूर्ण और सटीक अभिव्यक्ति...

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन शब्द समायोजन..... भावपूर्ण अभिवयक्ति....

प्रवीण पाण्डेय said...

काश समय औरों का मिलता,
मैं भी मन को सहला लेता।

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा....वाह!!

मनोज कुमार said...

कविता के भाव बहुत अच्छे लगे।

Navin C. Chaturvedi said...

रजनीश भाई आप शब्दों के माध्यम से अपनी बात कहने में समर्थ हैं

Mamta Bajpai said...

behad khubsurat rachana badhai

Arvind Mishra said...

ये कैसा उहापोह है ?

हरकीरत ' हीर' said...

ये ज़िन्दगी ही छलावा है .....

Rachana said...

sunder kavita man ko bhai
rachana

Anita said...

सचमुच हर कोई अपनी ही उधेड़बुन में लगा है.. दूसरों के दर्द की कहाँ फ़िक्र है...फ़िक्र करते हुए जो दीखते हैं वहाँ भी एक छलावा है... बहुत सुंदर कविता !

poonam said...

bahut khub...

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