Thursday, March 31, 2011

गुलाबजल

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आओ
बताऊँ  एक बात तुम्हें ,
मुझे तलाशते
जब तुम्हारी आँखों में गड़ता है कोई प्रश्नचिन्ह
कुछ धुंधला सा देखते हो ,
मैं कुछ शब्दों का गुलाबजल
बना कर लगा देता हूँ तुम्हारी आँखों में
मेरी झोली में शब्द हैं गिने-चुने
नतीजतन कुछ सवाल शब्दों में ही फंस जाते है
फिर शब्दों के चेहरे बदल कर पेश करता हूँ
कि थोड़ी और ठंडक पहुंचे
तुम्हारी आँखों को और
शब्द सफल हो जाएँ ,
पाँच अक्षरों की खूबसूरती को
बना  देता हूँ दो अक्षर का चाँद,
पर साथ घुस आता है 
दो शब्दों का दाग,
कैसे समेटूँ
सब कुछ तुम्हारे लिए..
कुछ शब्दों के मटके और
अविरल बहता जल,
इसलिए बेहतर होगा तुम आंखे बंद कर लो
महसूस करो ये प्रवाह ,
और एक स्पर्श में 
पूरा अभिव्यक्त हो जाऊंगा मैं  ...
...रजनीश ( 30.03.11)

Tuesday, March 29, 2011

हमराज़

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तुम चाहते हो सब कुछ कह दूँ तुम्हें,
एक बार फिर दिल खोल कर रख दूँ 
उन कुछ पलों को मेरे अपने हो जाओगे,
मैं  तुम्हें थोड़ा और मालूम हो जाऊंगा, 
जान जाओगे एक और राज़, 
फिर शांत हो जाएगी तुम्हारी जिज्ञासा, 
हम दोनों के बीच खुला पड़ा
सामने मेज पर मुझे
देखकर ऊब  जाओगे,
कर्तव्य पूरा करोगे, मैं समझता हूँ कहकर ,
फिर तुम्हें अपनी सलीब दिखेगी
जो तुम्हें निकालेगी मेरी कहानी से हमेशा की तरह
दूर होने लगोगे तुम वहीं बैठे-बैठे,
और फिर सब भूल जाओगे जाते-जाते ,
थोड़ी देर में मेरा भी भ्रम दूर हो जाएगा
कि मन हल्का हो गया, 
मैं थोड़ा और बिखर जाऊंगा,
खैर,  तुम सुन तो लेते हो ...  
....रजनीश (29.03.11)

Thursday, March 24, 2011

सड़क और सफर

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शहर की दीवारों
पर पड़े छींटे
गवाह हैं  होली से हुई मुलाक़ात के
जो गुजरी हाल ही,  मेरे शहर  की सड़कों से होकर,
कल मै था एक सड़क पर,
जिसके  सीने पर भी
दिखे कुछ सुर्ख लाल निशान,
होली ने कहा   मेरे तो नहीं, 
ये गवाह निकले 
एक मुसाफ़िर की मौत के,
जिसका सफ़र सड़क पर
ही ख़त्म हो गया था,
और एक पल में ही शुरू कर लिया था
उसने एक नया सफ़र,
सड़क ने कहा,
मुझे तो इस रंग से कोई प्यार नहीं,
मेरा  होली से कोई रिश्ता नहीं,
न ही कोई प्यास मुझे,
ये तुम्हारा अपना
तुम लोगों की ही अंधी दौड़
और पागलपन का शिकार है,
क़िस्मत को क्यूँ खड़े करते हो कटघरे में,
ये तो वक्त को पीछे छोड़
आगे निकलने  की कोशिश का नतीजा है,
मैं सड़क पर बढ़ता  रहा  ,
और आगे भी लाल धब्बे मिलते रहे
मैं सोचता रहा कि
आखिर  सड़क की बात
पर हम गौर क्यूँ नहीं करते ?
...रजनीश (24.03.11) 

Monday, March 21, 2011

होली के बाद

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क्या बताऊँ तुम्हें,
क्या खूब होली थी ,
क्या रंग चढ़ाया था यारों ने ,
सबको गले लगाया,
उसे भी सराबोर किया रंगों में,
याद नहीं गुलाल लगे
कितने गुझिए खा गया मैं,
नंगे पैर भंग की तरंग में
नाचता रहा  नगाड़े के फटने तक,
और फिर नशे को फाड़ा घंटों बैठ,
नींबू और पता नहीं क्या-क्या ...
जुगत तो बहुत लगाई थी
कि रंग कोई ना चढ़े,  पर
ज़ालिमों ने न जाने कौन सा रंग लगाया था,
चार घंटे घिस-घिस के जब छिल गई चमड़ी
तब कहीं उतरे ये रंग,
बड़ी मेहनत के बाद उतरी होली ,
देखो एक कण भी नहीं बचा
अब किसी रंग का ...
तुम नहीं कह पाओगे अब मुझे देख
कि वो जो झूम रहा था,
रंगों में डूबा जो प्रेम बाँट रहा था,
रंगों में घुल सब के संग-
एक हो गया था
वो मैं था ,
नहीं ,अब मुझे देख यह तुम कह नहीं पाओगे ...
कि मैंने होली खेली थी ...
  ...रजनीश (21.03.11)

Saturday, March 19, 2011

होली के रंग

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दिल से लगाओ रंग कभी खत्म नहीं होंगे....

आओ, ये  रंगो का मौसम है ,
खेलें इनसे और घुल-मिल जाएँ
इन रंगों में ,
केवल टीके और पिचकारी से नहीं
रंगों की बौछारों से खेलें ,
दोनों हथेलियों में भर-भर कर
अबीर-गुलाल उड़ाएँ ,
खुल जाएँ और पूरें भीगें,
महसूस करें इन रंगों को ... 
ये पल हैं सराबोर होने के,
पूरा-पूरा रंगने के पल हैं  ...
अच्छी तरह रंगने के लिए
करीब आना होता है ,
दीवारें तोड़नी होती हैं,
पूरी तरह रंगों में डूब जाने पर ही
लगते हैं सभी इक रंग में रंगे,
और तब असली रंग उतरता है दिल में...
प्रतीकों में नहीं ,
दिल खोल कर खेलें सभी,
सबसे मिलें ,सबमें मिल जाएँ ...एकरंग 
और ये त्यौहार बस चलता रहे...
...रजनीश (19.03.2011)
 (होली की शुभकामनाएँ ! )

Tuesday, March 15, 2011

कंपन

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धरती काँपती है ,
हर तरफ होता विनाश साक्षी है ।
दिन में ,
कुछ पलों के लिए
मैं  भी जमीन पर होता हूँ,
पर कभी महसूस नहीं हुआ,
जमीन का तनाव, वो कंपन ।
कल कान लगाकर
सुनने  की कोशिश की
धरती की धड़कन,
बस अपनी ही ध्वनि सुन सका ।
पर, शांति के इस समुद्र का  तल
अशांत पत्थरों का घर क्यूँ  है ?
धरती  अधूरी है अभी ,
अजन्मी, अर्धविकसित,  
तभी तो भीतर ये हलचल है ।
कुछ अभी तक अधूरा ।
क्यों ,मेरे अंदर भी
ढेर सारा और दबा हुआ
लावा है ?  क्यूंकि मैं भी
इसी धरती का पुत्र हूँ ?
इसका अंश , पूरा-पूरा धरती जैसा ,
मैं भी तो अभी गर्भ में हूँ ।
उसी अधूरेपन, उसी अपूर्णता
का रोपण इसकी छाती
पर भी करता हूँ ।
अपनी दुनिया बसाता हूँ,
एक अस्थिर नींव पर
अधूरा, अशक्त मकान  बनाता हूँ
और करता रहता हूँ असफल कोशिश
अपनी नश्वरता को पोषित
करने की इस घर में ।
बस एक आशा है ..
जब धरती  बन जाएगी पूरी,
तब  नदी  कभी गांव में नहीं आएगी,
सागर तांडव नहीं करेगा ,
झील गुम नहीं होगी,
पहाड़ चलना बंद कर देंगे,
हरी-हरी  चादर को नहीं जलाएगा लावा,
कोई घर भी नहीं टूटेगा,
और फिर मेरा जन्म होगा ,
एक शांत, संतुष्ट और सम्पूर्ण मैं ...
..रजनीश (15.03.2011)

Thursday, March 10, 2011

आखिर क्यूँ ?

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आसान सी  है  जिंदगी इसे दुश्वार क्यूँ बनाते हो,
हँसते-खेलते हुए दिलों को  बीमार क्यूँ बनाते हो ।

मिल रही हैं तुम्हें पेट भरने को रोटियाँ,
अपने कारखानों में  तुम  तलवार क्यूँ बनाते हो ।

ज़िंदगी तुम्हारी है   प्यार  का हसीं सौदा,
इसे चंद कौड़ियों का  व्यापार क्यूँ बनाते हो ।

छोटी सी छांव में ही  कटनी है ज़िंदगी,
इंसानी लाशों पे खड़ी ये  मीनार क्यूँ बनाते हो ।

चाहते हो हर कदम बांट ले थोड़ा दर्द कोई,
हर तरफ बँटवारे की  दीवार क्यूँ बनाते हो ।
....रजनीश (10.03.2011)

Monday, March 7, 2011

जड़त्व

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कई  बार  मरा,
और फिर से  जिया हूँ मैं,
पर  हर बार ही ज़िंदगी
वही रही पुरानी,
बस जैसे पत्ते झड़ गए
और फिर से आ गए,
कभी कुछ  घोसलें बन गए मुझ पर,
कभी कोई राहगीर
दो पल को रुक गया मेरी छाँव में,
कभी कोई फूल ले गया,
कभी किसी ने फल तोड़ा,
किसी को कांटे लगे,
हवाओं ने कई बार झुकाया मुझे,
साल दर साल
परतें चढ़ती रहीं मुझ पर ,
और अब तो बहुत विस्तार हो गया है मेरा,
मैंने सूरज और चंदा दोनों की किरणों को जगह दी है ,
और चाँदनी को भी दिया हैं बिछौना,
मेरे पास से गुजरती रही हैं ढेरों ज़िंदगानियां,
पर ठिकाना किसी ने नहीं बनाया यहाँ,
मुझे पता है कि, तुम
रहते हो दूसरे किनारे पर ,
क्या करूँ , नहीं पहुँच सकता तुम तक,
समय के साथ चलते-चलते
मेरी जड़े भी बहुत भीतर तक चली गईं
और अब भी वहीं खड़ा हूँ
जहां कभी  शायद
तुमने ही तो लगाया था मुझे ...
कम से कम देख तो सकते हो  ...
कभी समय निकाल तुम ही चले आते इधर ...
  ....रजनीश (07.03.2011)

Saturday, March 5, 2011

तुमने कहा था

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तुमने
कहा था,
कि जो चाँद  उस  रात  ,
तारों की चादर ओढ़े ,
तुम्हारी खिड़की पर आके बैठा था,
उसमें  एक पत्थर पे
खुदा मेरा नाम,
तुम पढ़ ना सके थे ...
पर मुझे उस पत्थर के करीब ,
धूल में बसे
तुम्हारे कदमों के निशान,
अब भी दिखते हैं ...
वो चाँद ,
मेरी खिड़की पर भी आता है, अक्सर ...
....रजनीश (05.03.2011)

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