Sunday, October 18, 2015

अक्टूबर के महीने में












[1]
डांस-बार फिर खुले अगर
वही होगा जो पहले देखा श्लील-अश्लील के बीच कहाँ पर खींचें लक्ष्मण-रेखा

[2]

कल के सपने बुन रहा है बिहार अभी चुन रहा है वादे बकझक सुन रहा है बिहार अभी चुन रहा है

[3]

फिर कुछ सुबहें खास हो गईं अपनी मैगी पास हो गई

[4]

सेल-डील के चक्कर में, गए अकल लगाना भूल अक्टूबर के महीने में यारों, बन गए एप्रिल-फूल

[5]

आग लगी हो घर हमारे तो कौन दुआरे आयेगा हमारी खुशियों की खातिर क्यूं अपने हाथ जलायेगा
..........रजनीश (18.10.2015) 

3 comments:

Onkar said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति

Anita said...

अर्थपूर्ण क्षणिकाएँ..

रचना दीक्षित said...

वाह एक दम ताज़े विषय रजनीश जी. सुंदर और सामायिक.

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