Sunday, October 25, 2015

नज़र

ना बदली वो राहें  पता मंजिल का भी वही
फिर क्यूँ भटका हुआ इन्सान नज़र आता है

कोई नजरों में रहके भी  नजरों से दूर रहे
ना होकर भी नजरों में कोई पास नजर आता है

दिल का आईना भी कितना ज़ालिम होता है
जब भी देखूं अपना चेहरा शैतान नज़र आता है

कोहरे की परत भी क्या क्या गुल खिलाती है
उगता गर्म सूरज भी चाँद नजर आता है

बड़ी उम्मीद थी जिससे तलाशा जिसे हर कहीं
खड़ा दुश्मन की तरह वो दोस्त नज़र आता है

है ये किस्मत या फितरत या ईन्सानी तादाद का असर
वो कीड़ों की तरह मरता कौड़ियों में बिकता नज़र आता है

तू मुझमें है मै तुझमें हूँ जो मुझमें वो ही तुझमें
क्यूँ चेहरे में तेरे फिर कोई और नज़र आता है
                              ..........रजनीश (25.10.2015)

1 comment:

रचना दीक्षित said...

राहें भी वही, मंजिल भी, फिर भी चलना कठिन ही लगता है. सुंदर नज़्म.

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