Sunday, January 24, 2016

उम्मीदें

कुछ रास्तों पर 
मील का पत्थर होता नहीं है  
और कोई हम सफर भी मिलता नहीं है 
फिर भी इन रस्तों पर 
भटकते-बिखरते 
क्या जाने कदम क्यूँ चलते जाते हैं

एक पन्ने पर 
जो लिखा है वो बदलता नहीं है 
नया कोई पन्ना भी मिलता नहीं है 
फिर भी कुछ किताबों को
पन्ने दर पन्ने 
क्या जाने नयन क्यूँ  पढ़ते जाते हैं 


एक सपने में 
जो गाया वो  सच होता नहीं है 
जो सपने मे पाया वो मिलता नहीं है 
फिर भी कुछ सपनों को 
जागते और सोते 
क्या जाने हम क्यूँ देखते जाते हैं 

मतलबी शहर में 
कोई अपना होता नहीं है 
ढूँढने से भी हमदम कोई मिलता नहीं है 
फिर भी एक पते को 
दर-दर खोजते 
क्या जाने हम क्यूँ पूछते जाते है 

.......रजनीश (24.01.16)

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया ।

प्रवीण पाण्डेय said...

फिर भी आशा है, हम जीवन में सबसे आस लगाये रहते हैं।

Satish Saxena said...

वाह , मंगलकामनाएं आपको !

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