Saturday, July 9, 2011

अंधेरा

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एक अंधेरा ,
मेरी आवाज
जब देख नहीं पाती तुम्हें ,
जब नहीं सुनाई देती मुझे
बातें दीवारों पर
लिखी इबारतों की,
जब हर वो चीज खो जाती है
जो दिला सके
तुम्हारे होने का एहसास ,
रात ज्यों घुस आती है कमरे में
छोड़कर चाँद-तारे
कहीं दूर  वादियों में,
आईना हो जाता है जब अंधा,
नज़रें दे जाती हैं धोखा,
अंधेरा छा जाता है
रोशनी के हर एक ठिकाने पर,
मैं कर लेता हूँ बंद आँखें
और एक छोटी सी लौ
कहीं मन से उतर कर
बैठ जाती है अंदर आंखों के करीब
दिखने लगता है पूरा मंजर
और जन्म होता है रोशनी का

मैं हूँ एक अंधेरे की परत
जो  फैली हो गर मुझसे बाहर
कुछ भी नज़र नहीं आता 
अंधेरे के सिवा
"मैं" ही है अंधेरा
इसे हर जगह से खुरचकर समेटकर
आँखों के अंदर बंद कर लेता हूँ
अंधेरा नहीं रह जाता है
एक अंधेरा रोशनी में भी रहता है ...
और बंद आँखों से वो दिखता है
जो रोशनी में छुपा रह जाता है ...
...रजनीश (09.07.2011)

5 comments:

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति,
हार्दिक बधाई ||

रश्मि प्रभा... said...

इसे हर जगह से खुरचकर समेटकर
आँखों के अंदर बंद कर लेता हूँ
per kuch bahar ghana sa sayaa rah jata hai

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

"मैं" ही है अंधेरा ...

Sach kaha.... Behad prabhavi rachna...Badhai

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

विचारोत्तेजक रचना

वन्दना said...

बेहद गहन और सटीक अभिव्यक्ति।

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