Thursday, February 13, 2014

प्रगति के पथ पर


क्या हो गया
कहाँ जा रहे हम
असहिष्णुता के रास्ते
अहंकार रथों पर
सब कुछ अपने कब्जे में करते
पूरे रास्ते को घेर चलते

अपनी सड़क
अपने कदम
थोड़ी भी जगह नहीं
औरों के लिए

अपनी ढपली
अपना राग
अपनी सोच
अपनी बात
अपने समीकरण
अपना दर्शन
अपना विचार
अपनी बिसात
आत्म मुग्ध
आत्म केन्द्रित

कदम कदम
बस अपना स्वार्थ
कदम कदम
छिद्रान्वेषण
कदम कदम
आलोचना
कदम कदम
ईर्ष्या
कदम कदम
प्रतिस्पर्धा

क्या यही है सच
क्या  यही है सही
क्या रास्ते होते ही हैं
अकेले और बस खुद के लिए
क्या यही है प्रारब्ध
क्या यही है नियति
क्या कोई और रास्ता नहीं ?


इसी रास्ते पर
यह भी लिखे देखा
स्वतन्त्रता /प्रगति /उन्नति
विश्वास नहीं होता !
शायद पत्थर
गलत लगा गया कोई
इतना संकरा कंटीला रास्ता
कैसे जुड़ा हो सकता है
इन शब्दों से ......................
रजनीश ( 13.02.2014)

9 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

लाजबाब,बेहतरीन अभिव्यक्ति ...!

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sushma 'आहुति' said...

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

Anupama Tripathi said...

थक कर हारता सा मन ...जैसे शब्दों मे झर आई है मन की पीड़ा !!
कर्मण्ये वाधिकारसते ........
यही श्लोक याद आया ...!!
शुभकामनायें ।

सुशील कुमार जोशी said...

वाह !

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस प्रस्तुति को आज की विशेष बुलेटिन - भारत कोकिला से हिन्दी ब्लॉग कोकिला तक में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

प्रवीण पाण्डेय said...

स्वतन्त्र और स्वराज।

शिवनाथ कुमार said...

आज लोग आत्मकेंद्रित हो गए हैं
सोचने को विवश करती सुन्दर रचना !

Anita said...

जीवन जितना आत्मकेंद्रित होता जा रहा है उतना ही दुःख भी बढ़ता जा रहा है..मार्मिक पंक्तियाँ !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

अद्भुत....सार्थक भाव

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