Monday, February 2, 2015

ख़्वाहिश


मिल जाती जो नज़रें होती मुलाक़ात की ख़्वाहिश
हो जाती गर मुलाक़ात होती है बात की ख़्वाहिश

हो जाता है शामिल रस्में तोड़ने वालों में मौसम
जब बारिश में धूप और होती है ठंड में बारिश

मांग लेते हम भी वही गर दूसरे दर्द नहीं होते
रह जाती है फेहरिस्त में नीचे चाहत की गुजारिश

मिल जाती कामयाबी कुछ हम भी बन जाते  
रह जाती कसर थोड़ी अपनी कौन करे सिफ़ारिश

करते हैं कोशिश कि बढ़ते किसी सफ़र पर कदम
हो जाती है फिर शुरू हमारे सपनों की साज़िश

...........रजनीश (02.02.15)

4 comments:

Anita said...

सपनों की साजिश ने कितना भटकाया है...हकीकत ही लायी है उसके द्वार पर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (03-02-2015) को बेटियों को मुखर होना होगा; चर्चा मंच 1878 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pratibha Verma said...


बहुत खूब।

रश्मि शर्मा said...

बहुत खूब है गजल..

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