Wednesday, April 15, 2015

एक वक़्त ऐसा भी

एक वक्त
ऐसा भी होता है
जब दिन गुजरता जाता है
घड़ी की सुई की तरह
बिना ठहरे कहीं भी कुछ घड़ी

बस कोल्हू की मानिंद
ज़िंदगी की सुई एक दायरे में
घूमती चली जाती है
जैसे पंखों को फैलाये
बिना फड़फड़ाए
तैरता हो एक बाज हवा मेँ

कुछ ठहरता नहीं
पर ज़िंदगी ठहर जाती हो जैसे
एक ऐसा ठहराव
जिसमें सुकून नहीं
जिसमें आराम नहीं
जिसमें पड़ाव नहीं
जिसमें कुछ रुकता नहीं
और फिर ये वक़्त
एक आदत बन जाता है

.......रजनीश  (15.04.15)

4 comments:

dr.mahendrag said...

जब व्यक्ति उम्र की ढलान पर होता है तब यह हालत विशेष रूप से हो जाती है , अच्छी यथार्थ को व्यक्त करती रचना

रचना दीक्षित said...

सुंदर प्रस्तुति. एक यथार्थवादी रचना.

रचना दीक्षित

Digamber Naswa said...

इसी आदत मिएँ ये जिंदगी यूँ ही गुज़र जाती है एक दिन ...

Onkar said...

सुन्दर रचना

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