Friday, December 3, 2010

एक बादल से मुलाक़ात

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आज सुबह का मौसम

कितना सुहाना था !

किसी कवि की साकार कल्पना की तरह,तभी

अचानक बादलों ने सूरज को ढका

और बारिश शुरू हो गयी थी...

खिड़की से झाँककर देख रहा था मैं ,

बड़ी बड़ी बूंदें /

बरबस अपना हाथ बढ़ा, खिड़की से बाहर

हथेली पर थाम लिया  मैंने बूंदों को ;

इच्छा हुई और चख लिया था  ...

स्वाद का खारापन , अचंभित करने वाला था ,

तभी दिखी बिजली की एक चमक और गूँजा बादल का क्रंदन,

फिर ,मैंने पूछ ही लिया बादल से इस खारेपन का कारण;

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उसने बताया ,

" ए दोस्त,

मैं एक अकेला बादल ,

छोटा सा,  बरस जाना चाहता हूँ

धरती पर ,

लेकिन कितना घिरा हुआ हूँ मैं,

जैसे कोई वजूद ही नहीं मेरा ...

और कई बादल घेरे हुए मुझे;

उधर से आते काले घने - संकट के बादल हैं ,

और इधर उमड़ते घुमड़ते ये भीमकाय ...

दरअसल सामान हैं -जलाने का ;

वो सामने धरती पर छा रही घटा - भय और आतंक की,

और उन, दूर तक दिखते दुख के बादलों से

तो तुम वाकिफ होगे,

DSCN1752इन सबके बीच मैं कुछ नहीं

जो हटा सके इन्हे  ऊपर से धरती के ,

मेरा अस्तित्व ही धरती से है ,

पर मैं और मेरी संगिनी, असहाय देखते हैं सब,

और सिवा आँसू के कुछ दे नहीं पाते"

मैं सुन रहा था

बादल को,

पता नहीं कब

चल पड़े थे आंसू ,

मेरी आखों से /

हथेली पर मौजूद खारी बूंदों से उनके मिलन

से जैसे भंग हुई मेरी तंद्रा ,

और फिर देखा मैंने बाहर खिड़की से,

बारिश अब भी बदस्तूर जारी थी .......

......रजनीश (20.08.1992)

1 comment:

rajneesh said...

थोड़ी सी काट-छांट और कुछ जोड़कर ये पुरानी रचना पेश की है...

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