Tuesday, November 16, 2010

दोस्त

rमन ,
मेरे दोस्त ,
शायद सबसे करीबी
कितनी निकटता है तुममें और मुझमें
लंगोटिया यार हो
तुम्हें कष्ट हुआ तो झलकता है मेरे चेहरे पर
मेरी खिलखिलाहट में छुपि होती है खुशी तुम्हारी ,
तुम मेरी आँखों से रोते हो,
तुम भटके तो मैं भटक जाता हूँ ,
शायद तुमहरे बिना मैं कुछ नहीं।
दिन भर तुम्हें साथ लिए घूमता हूँ ...
रात में तुम मुझे ले चलते हो अपनी दुनिया में
दोस्त,
अक्सर समुंदर की रेत पर तुम्हारे साथ दौड़ते मैं थक जाता हूँ
पर तुम दौड़ते रहते हो मुझसे आगे , हमेशा /
इस दौड़ में मुझे बड़ा मजा आता है/
दोस्त  ,
एक दिन तुमसे आगे मैं जरूर निकलूँगा .......

1 comment:

rajneesh said...

कालेज़ के दिनों में लिखी थी ये कविता

पुनः पधारकर अनुगृहीत करें .....