Wednesday, November 17, 2010

समय

घड़ी के गोल दायरे से मुक्त,
भूतकाल की गहराइयों से निकल,
वर्तमान को चीरता,
भविष्य की ओर निरंतर चलता रहता है समय
और काल की ये परिभाषाएँ दे जाता है /
गतिशील,
कभी अच्छा, कभी खराब
कभी क्रूर, कभी दयालु
कभी सीमित, कभी असीमित
कभी लौटता हुआ
तो कभी रुक सा जाता है,
पर अंततः गतिशील;
खिलती कली में
पगडंडी पर गहराते निशानों में
बनते बिगड़ते रेत के टीलों में
पत्थर पर जमती कई में
चेहरे पर पड़ती झुर्रियों में
एक छाप सी छोड़ जाता है ;
गतिशील
चलता ही जाता है
अपने से आगे निकालने की सारी कोशिशों को नाकाम करता हुआ
आत्मा अमर है,
शायद वो जानती हो ये कब पैदा हुआ /
या फिर जीवन की इन सभी अभिधारणाओं से परे है
कौन जाने

....रजनीश

1 comment:

rajneesh said...

wrote it long back, its undated, prob'ly in 1989

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