Thursday, November 25, 2010

अपना सा

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लगा था कोई,
अपना सा / हिस्सा खुद का लगा था....
देखा था उसे -भीड़ में /
नया था,पर लग रहा पुराना था/
जैसे खोया था कभी पहले कहीं ,
अब मिला था ....
जैसे टूटा था कभी पहले कहीं ,
अब आ जुड़ा था
अपना ही था जैसे या दूसरा अपने जैसा,
या फिर था कोई हिस्सा किसी सपने का
पर लगा था अपना /
ता जिंदगी हिस्से रहते हैं बिखरते / टूटते / जुड़ते / मिलते / बिछुड़ते .....
बिखरे टूट कर गिरे हिस्से एक जगह नहीं मिलते
कभी या कहूँ अक्सर कहीं पर भी नहीं .....
सारे हिस्से कभी साथ साथ नहीं होते ,
हिस्सों को जुड़ना होता है सफर में ...
हिस्से बटोरने और जोड़ने में
खुद बंटते जाते हैं हिस्सों में ,
और ढूंढते रहते हैं हिस्सा कोई अपना .....
DSC00486

....रजनीश

1 comment:

rajneesh said...

मेरी एक पुरानी कविता ....
stills r frm my hadicam...

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