Thursday, June 30, 2011

चंद शेर थोड़ा अफसोस

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उनकी हर अदा पे मुस्कुराते रहे हम
चुभता है दिल में ये कहना न आया

मरते मरते आदत मरने की हो गई
करते   हैं कोशिश पर जीना न आया

कब हुए वो संजीदा कब मसखरी की
हुए ख़ाक हम पर समझना न आया

हंसने से दिल को राहत पहुँचती है
गुदगुदाया खुद को पर हंसना न आया

दर्द की शक्ल क्या चेहरे पर झलकती है
दर्द हो गए हम पर दिखाना न आया

रियाया पे उनके सितम क्या कहें हम
काट ली पूरी गर्दन पर पसीना न आया

हसरत बहुत थी कुछ गुनगुनाएँ हम भी
जुबां पर कभी पर वो गाना न आया

कहते हैं लिखा सब हाथों  की लकीरों मे
फंस गए लकीरों में पर पढ़ना  न आया

न रदीफ़ न काफिया न मतला न मकता
ख़त्म हुए पन्ने   गज़ल कहना न आया
....रजनीश ( 30.06.2011)

Sunday, June 26, 2011

बरसन लागी बदरिया

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बरसन लागी बदरिया रूम झूम के ....
( ये बोल हैं एक कजरी के, बस इसके आगे कुछ अपनी पंक्तियाँ जोड़ रहा हूँ )

बरसन लागी बदरिया रूम झूम के ...

सूरज गुम है चंद भी गुम है
नाचती है बिजुरिया झूम झूम के ....

राम भी भीगें श्याम भी भीगें
भीगे सारी नगरिया झूम झूम के

प्यास बुझी और जलन गई रे
चहके  कारी कोयलिया झूम झूम के

दुख भी बरसे सुख भी बरसे
भीगती है चदरिया झूम झूम के

हर सावन ये यूं ही बरसे
बीते सारी उमरिया झूम झूम के
....रजनीश (25.06.2011)

Thursday, June 23, 2011

जवाब की तलाश में ...

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तन्हाई की हद का कोई हिसाब क्यूँ नहीं
अपनी किस्मत के सवालों का कोई जवाब क्यूँ नहीं

लगी उम्र   हमसे दिल का चुराना न हुआ
सिखा दे इश्क़ हमें ऐसी कोई किताब क्यूँ नहीं

गिरा दी  दीवार  हमने तोड़ फेंके सारे बंधन
फिर भी   हाथों में उनके एक छोटा गुलाब क्यूँ नहीं

मुझ गरीब से लेते हो एक पाई का लेखाजोखा
उस अमीर की कारस्तानियों का कोई हिसाब क्यूँ नहीं

भरे हैं मयखाने जिगर खराब  सुरूर फीका है
नशा हो ज़िंदगी तुम बनाते इसे शराब क्यूँ नहीं

सुधरो खुद फिर सुधारने चलो औरों को
सभी हों खुश तुम्हारी नज़रों में ऐसा ख़्वाब क्यूँ नहीं

क्या बदलेगी ये दुनिया बदल के क़ानूनों को
बदल जाये इंसान लाते ऐसा इंकलाब क्यूँ नहीं
...रजनीश (23.06.2011)

Saturday, June 18, 2011

बारिश

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धूप ने महीनों सुखाया था मिट्टी को
आखिरी बूंद तक निकाल ले गई थी
जली हुई जमीं की  राख़ उड़ती थी हवा में
छांव की ठंडक हवा संग बह गई थी

गरम थपेड़ों की मार ने
झुलसाया था दीवारों को
हर झरोखे में तड़पती
एक प्यास दिखने लगी थी

मिल गई थी तपिश
भीतर की जलन से
छू लेता था अगर कुछ
तो आग  लग जाती थी

फिर एक झरोखे से कूद कर
आई एक सोंधी खुश्बू
एक नमी का अहसास
पानी की एक बूंद मिट्टी से मिली थी

फिर, हर तरफ बूंदे ही बूंदे
बुझा रही थी जमीं की प्यास
पूरी ताकत और आवाज के साथ गिरती बूंदें
जमीं को तरबतर कर रहीं थीं

तैयार होकर आई थीं बूंदे
बादल और बिजली के साथ
बूंदे  मिट्टी में  बह रहीं थी कतार बांधे
एक बारिश मेरे भीतर हो रही थी
...रजनीश (18.06.2011)
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